शुक्रवार, 14 नवंबर 2014

पराजय

ढलती हुई धूप और आती हुई रात के मध्य ,सुहानी सी मनभाती हुई शाम , अपने-अपने घरौंदो में लौटते हुए पंछी ,टिमटिमाने को आतुर तारे , चाँद अपनी चाँदनी बिखेरने को बेचैन ,और मैं गरम चाय की प्याली अपने हाथ में लिये हुए इन सब को महसूस करती हुई अपनी बाल्कनी में बैठी कि इतने में अचानक फोन की घंटी बजी , उठाकर जैसे ही "हेल्लो" कहा दूसरी तरफ से माँ की भर्राई हुई आवाज सुनायी दी
"हेल्लो , निधी एक बुरी खबर है , नानी नहीं रहीं " और साथ ही सुनायी दी माँ की हिचकीयां ।
"क्या !! " मेरे हाथ से चाय का प्याला गिरते-गिरते बचा " कब हुआ यह ?"
"आज सुबह ही ,और अब तो उनका अंतिम संस्कार भी हो गया"
"क्या ? पर माँ नानी जी तो लखनऊ गयी हुई थी ना ! क्या मामाजी इतनी जल्दी वहां पहुंच गये ? जो अंतिम संस्कार भी हो गया? " मेरे मन में अनगिनत सवाल आने लगे।
"नहीं बेटा , नानी के भाई ने ही उनका अंतिम संस्कार किया  "
आँखें तो आँसूओं से भीग गयी पर मन में कहीं न कहीं इक सुकून सा हुआ यह जानकर ।
     कमला नानी , रिश्ते में तो वो माँ की मौसेरी बहन लगती पर माँ का उनसे सगी बहनों की तरह रिश्ता था , वो माँ से उम्र में काफी बडी थी तो हम सब भाई -बहन उन्हें नानी कहतेे , वह भी उतना ही प्यार देती।
नानी को शादी के कई साल तक कोई बच्चा न हुआ , और फिर जब गांठें होने की वजह से उनकी बच्चेदानी ही निकाल दी गयी, तब बच्चा होने की रही सही उम्मीद भी खत्म हो गयी। तब उन्होंने बच्चे को गोद लेने का निर्णय लिया , नाना जी तो मना करते  "क्या जरूरत है बच्चे की कमला , हम दोनों हैं न, एक -दूसरे की उम्र भर देखभाल करेंगे " पर नानी नहीं मानती उनका तर्क होता "नहीं जी जब हम दोनों बूढ़े होंगे, तब कोई तो होना चाहिये हमें संभालने वाला ,और फिर जब मरेंगे तब हमारा बेटा ही हमें मुखाअग्नि देगा ना " नाना इन तर्कों के आगे निरउत्तर हो जाते ।
नाना ठहरे पेशे से वकील और काफी पैसेवाले भी , तो बेटा गोद लेने में कोई दिक्कत नहीं आयी उन्हें किसी रिश्तेदार ने ही अपना बेटा दिया।
  नानी तो बेटा पाकर  इतनी खुश हुई मानो सारे जहान की खुशीयां उनके आँचल में समा गयी हों , उन्हें ऐसा लगने लगा  जैसे भगवान जिस सुख से उन्हें वंचित रखना चाहा ,उन्होंने उस फैसले के विरुद्ध जाकर  उस सुख पर विजय पा ली हो , इसलिये उन्होंने बेटे का नाम भी विजय रख लिया ।
बहुत लाड़ प्यार से पालती वो विजय मामा को , ऐसी कोई चीज न थी जिसकी कमी कभी महसूस कराई  हो उन्होंने ,पर कहते हैं ना कि हद से ज्यादा प्यार भी बच्चों को बिगाड़ देता है , उसी तरह मामा भी बहुत जिद्दी हो गये। पर उनकी हर गलती पर नानी "बच्चा है समझ जायेगा " कह कर टाल जाती । जब जवानी की दहलीज़ पर कदम रखा तब उन्हें अपने ही दोस्त की बहन रोमा पसंद आ गयी। नानी ने तो शुरू से ही जैसे उनकी हर जिद्द को पूरा करना अपना फर्ज़ समझा। इसलिये वह रोमा को अपने घर की बहू बना लायी ।
नानी की तो खुशीयों का अब कोई ठिकाना न रहा। वह रोमा मामी को अपनी बेटी की तरह रखने लगी ।
शादी के कुछ सालों बाद जब नाना जी को लकवा मार गया तब मामी ने बजाय नानाजी की देखभाल करने में मदद करने के उल्टा नानी से वो झगड़ा करने लगी। कि नानाजी की वजह से घर में बदबू फैलती है क्योंकि वह पूरी तरह से बिस्तर पर थे । आखिर एक दिन मामाजी ने मामी की बातों में आ कर नानी को अलग छोटा सा घर दिला दिया , पर नानी , उनको तो जैसे बेटे के प्यार में सब मंजूर था। बस बेटे को कोई तकलीफ न हो खुद चाहे जितनी परेशानीयों का सामना करना पडे ।
   दो सालों बाद नानाजी ने दुनियां से विदा ली , तब नानी अकेली रह गयी , रिश्तेदारों के तानों और दुनियादारी को देखते हुए मामाजी नानी को अपने घर ले गये ,पर !अब वक्त बहुत बदल चुका था , मामाजी पूरी तरह से सिर्फ़ मामी के पति थे , नानी के बेटे नहीं ।
एक दिन माँ और मैं अचानक नानी से मिलने पहुंच गये , मगर यह देखकर हैरानी हुई कि नानी को एकदम कोने वाला स्टोर रूम  दिया गया है ,जहां से घर में कौन कब आये जाये उन्हें पता भी न चले ।नानी हमें देखकर बहुत खुश हुई  " बहुत अच्छा किया जो तुम लोग आ गये " पर कुछ देर बाद वो उदास हो कर कहने लगी "देखो न मेरी मजबूरी मेरे घुटनों में दर्द है उठ नहीं सकती और रोमा घर पर नहीं कि तुम्हें चाय भी पिला सके ।"
"नानी ,हम चाय पीने नहीं आपसे बातें करने आये हैं , आपसे मिलने आये हैं " मैंने नानी को बीच में ही टोका । पर वह यह नहीं जानती कि हमारे लिये दरवाजा रोमा मामी ने ही खोला। मगर हम लोग चुप रहे , यह बताकर नानी का दिल नहीं दुखाना ठीक नही समझा।मामी भले ही नानी की बेटी न बन पायी पर नानी सदा माँ बन उनकी गलतीयों को छुपाती रहीं । हमें मामी का चाय  न पूछना नहीं अखरा मगर जाते समय जो नानी ने कहा उसे सुनकर हम दोनों आवाक रह गये। जब हम वापस घर जाने के लिये उठे तब नानी ने कहा " कहना तो नहीं चाहती, पर क्या तुम लोगों को एक तकलीफ दे सकती हूं ? "
"कैसी तकलीफ नानी ? इतनी औपचारिकता क्यूं कर रहीं हैं आप ?"
"नहीं बेटा , वो क्या है न विजय रात को देर से घर लौटता है तो रोमा को भी सोने में देर हो जाती है ,इसलिए रोमा सुबह देर से उठती है " नानी अटक-अटक कर कह रहीं थी , मानो जैसे कहना नहीं चाहती पर कोई मजबूरी कहलवा रही हो उनसे ,
"और ये लोग नाश्ता नहीं करते सीधे खाना खाते हैं , और मुझे बुढ़ापे में कहां इतनी नींद आती है। ऊपर से मरी ये शुगर की बीमारी , मैं जल्दी उठ जाती हूं तो भूख सहन नहीं होती खाना बनने तक , इसलिये अगर तुम बाहर से कुछ बिस्कुट के पैकेट यां केक ला दो तो सुबह वो खा कर मैं अपनी दवाइयां ले सकूं।"
" हां नानी क्यूं नहीं , मैं अभी ले आती हूं " कहकर मैंने माँ को वहीं बैठने का इशारा किया और जाने लगी ।
नानी ने रोक लिया "अभी नहीं , जब तुम लोग जाओगे ना तब बाहर से लाकर यहां खिड़की से दे जाना "
हम लोग समझ गए कि नानी मामी से डर की वजह से ऐसा कह रही हैं । खैर हम उस समय तो दे आए पर मन कचोटने लगा कि यह सब आखिर कब तक चलेगा ? हमने घर आ कर पापा से बात की ,कि वह मामा को समझायें ।
अगले ही दिन पापा ने मामा को फोन किया और उन्हें समझाया ,उस समय तो वह कुछ नहीं बोले मगर कुछ दिनों बाद नानी का फोन आया कि वह लखनऊ चली गयी हैं ,
मम्मी ने पूछा "इस तरह अचानक कैसे जाना हुआ दीदी , आपने तो कुछ बताया ही नहीं !"
नानी की आवाज धीरे -धीरे सिसकीयों में बदल गयी " अब वहां रहना मुश्किल हो गया साधना , तुम लोग उस दिन गये उसके कुछ दिनों बाद न जाने रोमा को क्या हुआ उसने मेरा कमरे का सारा सामान  वाचमैन को दे दिया बस एक कुर्सी रहने दी कमरे में और तो और तुम्हारे जीजाजी की तस्वीर को भी उठाकर सड़क पर फेंक दिया " नानी की सिसकीयां तेज होती गयीं और माँ की आँखों से भी अविरल अश्कों की धारा बह चली ।
खुद को ज़रा संभालते हुए नानी ने कहा " मैं ही पगली थी जो भगवान की मर्जी के विरुद्ध जाकर अपने लिये खुशी ढूंढ़ने गयी। समझी थी कि विजय पा ली है पर यह कहां जानती थी कि उस विजय के पीछे मेरी ही पराजय है ।"
उस के घटना के बाद नानी कुछ महीने ही जी पायी , दुख तो हुआ नानी की मृत्यु का समाचार सुनकर ,मगर यह जानकार संतोष भी हुआ कि नानी ने ही मामा से उनको मुखाअग्नि देने का अधिकार छीन लिया था । और तब हम सबने मामा से सारे संबंध तोड़ लिये ।

गुरुवार, 13 नवंबर 2014

बचपन

सभी मित्रों को बाल दिवस की शुभकामनाएं

कितने  प्यारे होते हैं
बचपन के वो दिन
सब संग हंसना खेलना
मिलते ही दोस्त बना लेना
न दुनियादारी की चिंता
न अपने-पराये का भरम
वहीं लड़ना वहीं माना जाना
छुपम-छुपाई , लंगडी खेलना
कितने सारे खेल होते थे
तब तो दिलों से मेल होते थे
उन्मुक्त जीवन जीते थे
दिल से मुस्कराया करते थे
मुस्कराते तो अब भी हैं
पर अब मुस्कान ज़रा भारी है
हसते तो हैं पर जैसे ,लाचारी है
होंठों पर हसी और
दिमाग में दुनियादारी है
खुलकर मिलना भूल गये हैं
दुनियादारी निभाते हुए अब
मन से जीना भूल गये हैं
काश ! वो दिन फिर से लौट आयें
जो बचपन पीछे छूटा
उसे फिर से जी पायें ,,,,,,
प्रिया

रविवार, 9 नवंबर 2014

व्यथा

चित्कार रहा आज मेरा मन
भीगा है आँसूओं से दामन
क्या की थी मैंने ऐसी खता
जो तार-तार किया तुमने मेरा दामन
गर लड़की होना कसूर था मेरा
तो क्यूं लड़की के रूप में न दिखी
तुम्हें तुम्हारी माँ और बहन

लूटकर अस्मिता मेरी क्या तुमने पाया है
महज चंद मिनटों के जोश में तुमने
एक मासूम का जीवन गंवाया है
अब कैसे सामान्य जीवन जी पाऊंगी मैं
तुम्हारे इस कृत्य के बाद
अब कैसे घरवालों से नजरें मिला पाऊंगी मैं
तुम्हारा यह घिनौना रूप देखने के बाद

कौन अपनाएगा अब मुझे
कौन थामेगा अब मेरा हाथ
   सच कहना !
क्या तुम ही चलना पसंद करोगे
जीवन भर ऐसी लड़की के साथ !
  गर नहीं !
तो किसने दिया था तुम्हें यह अधिकार
जीवन उजाड़ देना किसी मासूम का
क्या यही थे तुम्हारे संस्कार !

कभी सोचा तुमने क्या होगा मेरा हाल
किस कदर हुआ होगा मेरा मन तार-तार
किस कदर महसूस किया था मैंने
खुद को बेबस और लाचार
ज़रा दिल पर हाथ रखकर बताना तुम
क्या कभी सह पाओगे तुम अपनी
बहन या बेटी पर होते यह अत्याचार !
  
गर नहीं
तो क्यूं किसी की बेटी पर
यह जुल्म ढाया है
क्यूं शर्मिंदा कर के उसको
अपनी मर्दानगी का सबूत दिखाया है
क्या औरत को दबाना , कुचलना
यह मर्दानगी है !

  गर नहीं
तो क्यूं मैं महसूस करूं खुद को शर्मसार
क्या गलती की थी मैंने !
असल मैं तो तुम हो गुनहगार
शर्मसार तो तुम हो जिसने
मुझे इक खिलौना समझ रौंदा है
शर्मसार हो वह दहलीज
जहां तुमने ऐसे संस्कार पाये हैं
शर्मसार तो होती होगी वह कोख
जिसको तुमने आज छला है ।
प्रिया