शुक्रवार, 16 जनवरी 2015

संस्कार

संस्कार
    शाम का समय बाजार में काफी चहल-पहल थी कुछ लोग वहीं खडे खोमचे वालों के पास खा रहे थे सहसा सब का ध्यान एक तरफ से आ रही चिल्लाने की आवाज़ पर गया , एक आदमी पास खडी बूढ़ी भिखारन पर बुरी तरह से चिल्ला रहा था वह अपने बच्चों के साथ शायद उस ठेले पर कुछ खा रहा था और वह भिखारन वहां जा कर उससे कुछ मांगने लगी तो वह उस पर बरस पडा वह बूढ़ी अम्मा तो सर नीचा किये चली गयी वहां से मगर यह सब देखकर अच्छा नहीं लगा मुझे किन्तु अफसोस मैं कुछ कर भी नहीं पायी
      मुझे अपने बचपन के दिन याद आ गये जब भी कभी कोई मांगने वाला दिखता तो हमारे घर के बडे कुछ खाना या पैसे हम बच्चों में से किसी के हाथ में देते कि दे दो , या फिर हम मंदिर जाते तब भी दान पेटी में हमारे हाथ से पैसे डलवाते या पंडित को दक्षिणा देने के लिए कहते  ,बाकी बच्चे तो चुपचाप उनकी बात मान लेते मगर मेरी  शुरु से ही सवाल करने की प्रवृत्ति रही है और जब तक बात को ठीक से समझ ना लूं मन शांत नही होता , किन्तु यह एक ऐसा सवाल था जिसपर हमेशा मेरी माँ का एक ही जवाब होता "कि यह बताकर समझाने वाली बात नहीं है जब बडी हो जाओगी तब खुद ब खुद समझ जाओगी" , और आज सच में यह बात समझ आ गयी कि क्यूं घर के बडे बच्चों के हाथों से दान दिलवाया करते हैं
   दरअसल यह एक तरह के संस्कार सिखाने का तरीका है जो कि बच्चों में बताकर कर या समझा कर  नही डाला जा सकता। घर के बडे बच्चों के हाथों से दान दिलाकर या मंदिर में चढावा चढाकर उनमें एक तरह से देने की प्रवृत्ति या यू कहें कि मानवता का बीज बोते हैं , ताकि बच्चे स्वार्थी बनकर सिर्फ़ अपने बारे में ना सोचे बल्कि मिल बांट कर रहने की उनमें आदत हो , आज मेरी भी यही आदत है मैं अपनी बच्ची के हाथ से दिलवाती हूं और वह भी जब मुझसे वैसे ही सवाल करती है तब मैं भी माँ की बात को दोहरा देती हूं
  फर्क यह नहीं पडता कि हम क्या दे रहे हैं और कितना दे रहे हैं होता यह है कि हम अपने बच्चों में देने की भावना को जागृत कर उनमें स्वार्थी होने की भावना का दमन कर रहे हैं जिससे कहीं न कहीं आगे जाकर यह संस्कार उनका भला ही करेंगे
    आज उस भले आदमी ने चाहे उस बूढ़ी औरत को फटकार कर अपनी ताकत का सबूत दिखाया मगर उसके बच्चों ने इससे क्या सीखा संस्कार या स्वार्थी होना ?

शनिवार, 3 जनवरी 2015

खत

खत , चिठठी , पत्र , कितने प्यारे दिन थे वो भी जब सब डाकिया बाबू का इंतजार किया करते , दूर से ही उनकी साइकिल की घंटी की आवाज सुनते ही सब के चेहरे पर रौनक आ जाती सब अपने कामों से हाथ खीचकर मुस्करा कर उनका स्वागत करने के लिए तैयार रहते ,सब को अपनी चिठ्टियों का इंतजार रहता  दादा जी को लगता शायद उनके भाई या दोस्त का खत होगा , दादी सोचती चाचा जी या बुआ की चिठ्ठी होगी , माँ रसोईघर से चुपके से झांकती कि शायद उनके मायके से बुलावा आया हो ,सबकी उम्मीदें जुडी होती उस खत के पढे जाने तक ।
अगर कहीं पोस्टकार्ड की जगह लिफाफे में खत हो और ऊपर भैया का नाम हो तब तो जरूर यह भाभी की तरफ से आया है , भैया शरमाते हुए खत को लेकर बाहर चले जाते और कहीं एकान्त में उसी खत को बार -बार पढ़ते ,जैसे हर बार पढ़ने पर उसमें से कोई नया संदेश निकल आयेगा। और कहीं कोना कटा हुआ पोस्ट कार्ड आता तो सब के मन में भय आ जाता कि हमारी तरफ से बुरी खबर न हो । ऐसा खत देते हुए डाकिया बाबू के चेहरे पर भी उदासी होती थी , और कहीं खुशी की खबर हो तब तो उनकी मिठाई जरूर बनती थी , मुझे अच्छी तरह से याद है दीवाली पर जिस तरह घरवालों , रिश्तेदारों के लिए मिठाई आती थी उसमें एक पैकेट डाकिया बाबू का भी जरूर होता ,और हो भी क्यूं ना आखिर हमारा देश है भी ऐसा जहां सुना है प्रेम का संदेश लाने वाले कबूतर की चोंच को भी सोने से मड़वा दिया जाता था। उसी तरह डाकिया बाबू हर एक के लिए जैसे घर का ही हिस्सा होते थे ।
हमारी फिल्मी दुनियां भी खत , डाक से अछूती न थी कितने मीठे गाने होते थे पुरानी फिल्मों में ,
खत लिख दे संवरिया के नाम बाबू कोरे कागज़ पे लिख दे सलाम बाबू वो जान जायेंगे पहचान जायेंगे ..... बहुत कम शब्दों में सांवरिया उसके मन की बात को समझ जायेंगे
हमने सनम को खत लिखा.....
और चिठ्ठी आई है वतन से चिठ्ठी आई है बडे दिनो के बाद.....
संदेसे आते हैं हमें तडपाते हैं .....,
इन गानों ने तो न जाने कितने लोगों की आँखें भिगो दी थी
और डाकिया डाक लाया तो पूरा गाना ही डाकिया बाबू के लिए बनाया गया था
         मगर जैसे फोन लगा चिठ्टियों का प्रचलन थोडा कम हुआ क्योंकि अब लोग फोन पर ही हाल चाल पूछ लेते पर फिर भी यह सिलसिला बंद नहीं हुआ , मगर पिछले दिनों में जब से फोन की जगह मोबाईल ने ली है  तब से तो चिठ्टियों की प्रथा ने तो दम ही तोड़ दिया है और उस पर अब फेसबुक और व्हाटस अप ने तो जैसे सारी दुनियाँ ही बदल दी है अब कोई प्रियतम के खत का इंतजार नहीं करता क्योंकि सुबह उठते ही मोबाईल पर गुड मोर्निंग हो जाती है। कोई डाकिया बाबू का इंतजार नहीं करता क्योंकि पता है अब किसी अपने का कोई खत नहीं आने वाला सारी बातें मोबाईल पर ही हो गयी हैं। अगर डाकिया बाबू आये भी तो कोई सरकारी कागज़ ही लायेगा ।
विज्ञान ने तरक्की तो कर ली हम अब दूर दराज के लोगों के तो पास आ गये हैं मगर फिर भी न जाने क्यूं मन में अब दूरीयां बढ़ गयी हैं , पहले चिठ्टियों में जितना कम शब्दों में अपनापन और प्यार होता था वहीं आज-कल की लंबी बातचीत और दिन भर वाटस एप पर भी जुड़े रहने से रिश्तों में प्रगाढ़ता नहीं रही , जहां विज्ञान की तरक्की से हमने बहुत कुछ हासिल किया है वहीं हमने काफी कुछ खोया भी है ।
मैं विज्ञान से मिलनेवाले फायदों को नकार नहीं रही मगर क्यूं ना दोस्तों कुछ ऐसा किया जाये कि ज्यादा न सही मगर महीने में कम से कम एक खत हम किसी अपने के नाम लिखें , इससे जहां हमारे हम अपना प्यार जता सकेंगे वहीं थोड़ी बहुत ही सही खत लिखने की परम्परा फिर से लौट आएगी और इस तरह खत पाने वाले के चेहरे पर भी कितनी प्यारी मुस्कान आएगी ना ।
प्रिया वच्छानी