सुजाता और विवेक रात के लगभग दस बजे घर पहुँचे। सुजाता की माँ को दिल की बीमारी थी और आज उसका शहर के अस्पताल में ऑपरेशन हुआ। सुबह से विवेक और सुजाता वहीं गए हुए थे। सुजाता का तो मन था वहीं माँ के पास रुकने का और विवेक ने भी कहा था "अगर चाहती हो तो रुक जाओ"। किन्तु सासु माँ के डर से वह न रुकी और विवेक के साथ ही वापस घर आ गयी।
आते ही विवेक और सुजाता सीधा माँ के पास आये। विवेक वहीं बैठ गया और सुजाता ने सास के पैर छुए।
बजाय माँ की तबियत पूछने के सुजाता की सास उसके सामने ही विवेक पर भड़क गयी "क्या जरूरत थी तुम्हें सुबह से अपना काम छोड़ कर इसके साथ अस्पताल के चक्कर लगाने की?"
"माँ आप जानती हैं मम्मी जी का आज ऑपरेशन था, फिर भी यह सवाल कर रही हैं?" विवेक ने हैरत से कहा
"ऑपरेशन ही था न मर तो न गयी थी। जो उसके पीछे अपना पूरा दिन खराब कीया। वैसे भी वहाँ सब तो होंगे ही फिर तुझे क्या जरुरत थी जाने की? दामाद को सिर्फ शादी ब्याह के मौकों पर जाना चाहिए ऐसे नहीं।" सुजाता की सास और भड़कते हुए बोली।
अपनी सास से ऐसी बाते सुन सुजाता के पैरों तले धरती खिसक गयी। वह सोचने पर मजबूर हो गयी कि जो सास दिन रात उसे सास और माँ में फर्क न करने की सलाह देती रहती वही आज उसके मायके में बुरा वक्त आने पर बेटे को ऐसी राय दे रही है। न चाहते हुए भी उस दिन के बाद सुजाता अपनी सास में अपनी माँ का रूप न देख पायी।
दामाद को सिर्फ शादी ब्याह के मौकों पर जाना चाहिए, ससुराल में सिर्फ खातिरदारी करवानी चाहिए। आज के समय में भी काफी लोगों को अपने बेटों को यह समझाते हुए आपने सुना होगा। किन्तु जब बात अपने पर आती है तब वह अपने दामाद से बेटा बनने की उम्मीद करते हैं। आखिर यह दोहरा मापदंड क्यों? एक लड़की जब अपने सारे रिश्ते पीछे छोड़कर नए रिश्तों को अपनाती है, उन्हें उतना ही सम्मान देती है तो क्या लड़के का फ़र्ज़ नहीं बनता वो भी लड़की के माँ-बाप को, उसके रिश्तों को उतना ही सम्मान दे ? जब ससुराल पक्ष पर कोई मुसीबत आती है तब सभी को बहू से उम्मीद होती है कि वह बेटी बन सबको अपना समझ सारे कर्तव्य निभाये। अगर बहु बेटी बन सकती है तो क्या दामाद बेटा नहीं बन सकता ?
कहीं-कहीं परिवार वालों की ऐसी सोच अब भी है जो की सर्वधा गलत है। किन्तु तब लड़कों को अपनी समझदारी दिखाते हुए सामंजस्य बिठाकर चलना चाहिए क्योंकि जब आप अपनी पत्नी से ऐसी आशा रखते है तो पत्नी को भी आपसे थोड़ी उम्मीदें तो होगीं ही। ज्यादा कुछ नहीं बस थोड़ी बातों का ध्यान रखकर आप अपने रिश्ते को और मजबूत बना सकते हैं। वह बातें कौन सी हैं आइये जानते हैं
सबसे पहले जैसे आप अपने माँ-बाप की इज़्ज़त करते है वैसे ही अपने सास-ससुर की भी इज़्ज़त करें
ससुराल पक्ष के किसी भी समारोह में सिर्फ खातिरदारी करवानी है यह सोचकर कभी न जाएँ बल्कि यह सोचें कि ये मेरे घर का ही कार्यक्रम है और मुझे इसे संभालना है। अपने ससुराल का संबल बनें बोझ नहीं।
अगर कभी उनपर कोई बुरा समय आये तो कदम से कदम मिलाकर खड़े हों। वहां कई लोग हैं कोई ना कोई रास्ता निकाल ही लेंगे यह सोच कर हाथ पर हाथ धर के न बैठें।
एक बात का अवश्य ध्यान रखें कि सहायता तो अवश्य करें किन्तु अनावश्यक हस्तक्षेप या फिर जैसा मैं कह रहा हूँ वैसा ही हो ऐसी उम्मीद कतई न करें।
और सबसे अहम् बात ससुराल पक्ष की किसी भी तरह से मदद करने के बाद अपनी पत्नी को बार-बार उस बात को न सुनायें और न ही कभी उस बात का ताना दें। क्योंकि एक तो ऐसा करने से आपके द्वारा की गयी सारी मेहनत पर पानी फिर जाएगा और दूसरा ये आपकी पत्नी के अपनी ससुराल के लिए किए गए कार्यों के सामने गौण है।
इन छोटी-छोटी बातों पर ध्यान देने से आपके रिश्ते न सिर्फ आपके ससुराल वालों के साथ मजबूत होंगे बल्कि आप सदैव उनके मुँह से यह भी सुनेगें हमने बेटी देकर दामाद नहीं बेटा पाया है। और आप पति-पत्नी के संबंधों में भी प्रगाढ़ता आएगी।
मंगलवार, 12 जनवरी 2016
जरा से ध्यान से बच सकते हैं रिश्ते
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