रविवार, 13 मार्च 2016

होली

रंग बिखेर कर प्रेम का
आओ प्रिय खेले होली
भिगो दें आज धरा को
प्रेम प्रीत की फुहारों से
आओ करें हँसी ठिठोली
रंग बिखेर कर प्रेम का
आओ प्रिय खेले होली
होली वसंत ऋतु में मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण त्योहार। होली हिंदू पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है रंगों का त्योहार कहा जाने वाला यह पर्व मुख्य रूप से दो दिन मनाया जाता है। पहले दिन होलिका जलाते हैं जिसे होलिका दहन भी कहते हैं दूसरे दिन धूलिवंदन मनाया जाता है इस दिन लोग एक दूसरे को रंग, अबीर-गुलाल से सरोबर कर देते हैं। होली के गीत गाये जाते हैं और घर-घर जा कर लोगों को रंग लगाया जाता है। होली के दिन लोग पुरानी से पुरानी दुश्मनी को भी भूलकर एक दूजे के गले मिलते हैं और रंग लगाते हैं। और घरों में खीर, पूरी आदि विभिन्न व्यंजन बनाये जाते हैं किन्तु इसमें गुझियों का स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण होता है होली के रंगो में सराबोर हो गुझिया खाने और खिलाने का एक अपना ही अलग आनंद आता है।
वैसे तो होली के पर्व से जुडी अनेक कहानियां प्रचलित हैं किन्तु इनमें से सबसे प्रसिद्ध कहानी प्रह्लाद की है। कहा जाता है कि प्राचीन काल में हिरण्यकश्यप नाम का एक अत्यंत बलशाली असुर था। अपनी ताकत के घमंड में इतना चूर हुआ के वह स्वयं को ही ईश्वर मानने लगा, उसने अपने राज्य में ईश्वर का नाम लेने पर पाबंदी लगा दी किन्तु उसका का पुत्र प्रह्लाद ईश्वर भक्त था, प्रह्लाद की ईश्वर भक्ति से नाराज हो  उसने बेटे को अनेक कठोर दंड दिए, परंतु उसने ईश्वर की भक्ति का मार्ग न छोड़ा। हिरण्यकश्यप की बहन होलिका को वरदान मिला था कि वह कभी आग में भस्म नहीं होगी। हिरण्यकश्यप ने बहन को आदेश दिया कि प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठे। किन्तु कहा जाता है न ईश्वर कभी अपने भक्तो का अहित नहीं होने देते इसी तरह आग में बैठने पर होलिका तो जल गई, पर प्रह्लाद बच गया ईश्वर भक्त प्रह्लाद की याद में इस दिन होली जलाई जाती है।
हमारे समाज में इस दिन भक्त प्रह्लाद को साक्षी मानकर दो मीठी रोटियां बनायीं जाती हैं और उनपर चारो तरफ सफ़ेद कच्चा धागा लपेटकर उसे गाय के उपलों पर सेका जाता है उस सफ़ेद धागे को भक्त प्रह्लाद का प्रतीक माना जाता है और होता भी वैसा ही है जलते अंगारों में रोटियां तो सिक जाती हैं किन्तु वह धागा नहीं जलता। वैसे कई नास्तिक स्वभाव के लोग इसे अंधश्रद्धा का भी नाम दे सकते हैं किंतु फिर भी अपनी-अपनी मान्यताएं हैं और वैसे भी भारतीय संस्कृति का आधार श्रद्धा और भक्ति है जिसे तर्क से नहीं बल्कि आस्था से ही समझा जा सकता है।
ब्रज की होली आज भी सारे देश के आकर्षण का बिंदु होती है व बरसाने की लठमार होली काफ़ी प्रसिद्ध है। इसमें पुरुष महिलाओं पर रंग डालते हैं और महिलाएँ उन्हें लाठियों तथा कपड़े के बनाए गए कोड़ों से मारती हैं। इसी तरह मथुरा और वृंदावन में भी १५ दिनों तक होली का पर्व मनाया जाता है।
किन्तु आज कल महीना भर पहले से ही गुब्बारों में या छोटी सी प्लास्टिक की थैलियों में रंग और पानी भरकर लोग अपने घर की ऊपरी मंजिल से रास्ते पर चलने वाले लोगो को या गाड़ियों को निशाना बनाते हैं जिससे कई बार दुर्घटनाएं भी हुए हैं और इतनी ऊपर से मारने पर लगने वाले को कहीं भी वो गुब्बारा लगता है और चोट पहुचती है। कई लोग इस दिन पर्व मनाने के नाम पर भांग या अन्य प्रकार के मादक पदार्थों का सेवन करते हैं जो के सरासर गलत है।
दोस्तों होली प्रेम प्यार हर्षोउल्लास का प्रतीक है इसे वैसे ही मनाये किसी को नुक्सान या तकलीफ पहुँचाकर या फिर नशा करके उटपटांग हरकते करने पर हमें बाद में आत्मग्लानि हो सकती है तो क्यों ऐसा काम करना जिससे हमे बाद में पछतावा हो !
हर्षोल्लाह के इस पर्व को भले ही विभिन्न प्रान्तों में अलग अलग प्रकार से मनाया जाता हो पर होली प्रेम, प्यार और बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है तो इसे प्यार से ही मनाये।
प्रिया वच्छानी