रविवार, 10 अप्रैल 2016

आत्महत्या

आत्महत्या ये शब्द सुनकर ही दिल दहल जाता है। दिमाग में विचार कौंधने लगते हैं कैसे कोई खुद को इतनी तकलीफ दे सकता है? कैसे कोई अपना जीवन खुद समाप्त कर सकता है? वो भी उस जीवन को जिसपर उसका अपना अधिकार ही नहीं। क्योंकि वो अधिकार तो उस परम पिता परमात्मा का है जिसने उसे जन्म दिया, उसके बाद जीवन पर अधिकार उस माता पिता का है जो उसे इस दुनिया में लाये। कितनी तकलीफों से माँ गुजरती है, कितनी पीड़ा सहती है तब कहीं जाकर बच्चे का जन्म होता है। कितनी मेहनत करता है पिता उस बच्चे को पढ़ाने लिखाने के लिए, जी जान से कोशिश करता है उसे एक अच्छी जिंदगी देंने के लिये, उसे वो सारी सुख सुविधा देने के लिए जिसका आभाव कभी उसने देखा हो। 
किन्तु आज-कल के बच्चों पर तो न जाने कैसा ज़रा-ज़रा सी बात पे आत्महत्या करने का जूनून सवार हुआ दिखाई दे रहा है। । अभी कुछ दिन पहले ही टीवी सीरियल की मश्हूर युवा कलाकार प्रत्युषा बेनर्जी की आत्महत्या की खबर सुन दिल दहल गया। इतनी महशूर कलाकार, इतनी प्यारी और इतनी छोटी सी उम्र में ऐसा कदम? उसके आत्महत्या करने का सही कारण तो अब तक पता नही चल पाया किन्तु क्या आत्महत्या करने का भी कोई सही कारण होता है? क्या आत्महत्या करना जायज है ? बिना परिस्थितियों से लड़े उनसे डर जाना और ऐसा कायरता भरा कदम उठाने से पहले एक बार तो अपने माँ बाप के बारे में सोचना चाहिए। जिंदगी में उतार चढ़ाव तो लगे ही रहते हैं पर उनसे घबराकर ऐसा कदम उठाना सरासर कायरता है। 
हमारे पड़ोस में ही एक बाईस साल के लड़के ने महज इसलिए आत्महत्या कर ली क्योंकि उसके पिता ने नया घर लिया और वो लोग वहां रहने चले गए। नए माहौल में लड़के का मन नहीं लग रहा था वो उनसे पुराने घर में वापस चलने की जिद करने लगा। जबकि पिता ने कहा भी के वो घर भी अभी बेचा नहीं है जब मन करेगा वहां भी चलेंगे किन्तु आज कल के बच्चों में तो सहनशक्ति या इंतज़ार नाम की कोई चीज ही नहीं बची। बस उसने आत्महत्या कर ली और लिख गया पत्र अपने पिता के नाम और वो पत्र भई ऐसा के जो पढ़े दंग रह जाए 
मैंने आपसे पुराने घर में चलने के लिए कहा किन्तु आप नहीं माने अब मैं आत्महत्या करने जा रहा हूँ और इसका जिम्मेदार कोई नही। मेरी मोटर साइकिल बेच कर जो पैसे आये उनसे मेरा अंतिम संस्कार मेरे दोस्तों से ही मेरे पुराने घर में करवाया जाए। मेरी लाश को हाथ लगाने का भी अधिकार मैं अपने पिता से छीन रहा हूँ। मेरे सारे अंतिम क्रियाकर्म की रस्में मेरे दोस्तों से करवायी जाएँ ।
ये सब उसके माता पिता नहीं सह सके और वो अवसादग्रस्त हो गये। 
और यही नहीं आज कल तो बोर्ड के परिणाम घोषित होने के पहले नदियों पर, रेलवे ट्रैक पर और ऐसी कई आत्महत्या करने वाली जगहों पर पुलिस बल देखने मिलते हैं। ताकि कोई बच्चा फ़ैल होने पर ऐसा कोई कदम न उठाये। 
ये क्या हो गया है आजकी युवा पीढ़ी को? क्यों जीवन में लड़ने की क्षमता नहीं बची उनमें? कैसे वो इस कदर हालातों से घबराकर ऐसे कदम उठाते हैं? कहीं उसकी वजह हम बड़े ही तो नहीं? हम जो सारे सुख सुविधाये बच्चों को दे रहे हैं कहीं हम ही तो उनकी नींव कमजोर तो नही कर रहे? कहीं प्रतिस्पर्धा के इस माहौल में उसकी रूचि या राय जाने बिना हम ही तो इस दौड़ में उनको धकेलकर उनके साथ कोई अत्याचार तो नहीं कर रहे? हमें इसकी वजह खोजनी होगी। 
हर एक बच्चे में अलग-अलग काबिलियत होती है, अलग-अलग हुनर होता है उसके हुनर को पहचानकर, उसकी रूचि को जानकार उसे वह काम करने दें। ये नहीं के बस तुम्हें पढ़ना है डॉक्टर या इंजीनियर बनना है। अब हर बच्चा डॉक्टर या इंजीनियर तो नही बन सकता न!! और वैसे भी दुनियां को हर तरह के टेलेंट की जरूरत है सिर्फ गिने चुने लोगों की नहीं। 
बच्चों को अपने सुविधानुसार जरूर काम करने दें किन्तु समय समय पर उनकी खोज खबर भी लेते रहें। यह जानते रहें के जीवन में या काम में आये उतार चढ़ाव के कारण कही बच्चा किसी अवसाद का शिकार तो नहीं बन रहा। कभी बिना मतलब के भी उसे उत्साहवर्धक कहानियां बताये या फिर आपने भी तो जीवन में कम उतार चढाव नहीं देखे होंगे। उनके साथ बैठकर वो अनुभव उनसे बांटते रहें। पता भी नहीं चलेगा जाने अनजाने आपने जीवन के संघर्षों से लड़ने के लिए उन्हें कितनी शक्ति दी। कम अंक आने पर या फ़ैल होने पर बजाय डांटने या दोष देने के प्रेम से उन्हें पढ़ाई का महत्त्व समझाएं ये समझाए वो आगे जो करना चाहते हैं वो करें किन्तु बिना पढाई के भी जीवन कुछ नहीं। 
बड़ों को ही बच्चों की मानसिकता को समझकर उन्हें संभालना होगा क्योंकि बच्चे तो हमारे ही हैं न!!!!!
प्रिया वच्छानी 
उल्हासनगर/ मुम्बई