अनिर्वचनीय है
संत कबीर की महिमा
न कर सकता कोई
कभी इनका बखान
हम है इक छोटी सी चींटी
वह थे कवी बड़े महान
थे भक्ति काल के
इक ऐसे कवी वो
सामाजिक आडम्बरो
पर जो करते प्रहार
थे समाज सुधारक
लोक कल्याण पर
देते थे अपनी जान
कोई कहता लहरतला तालाब
के कमल पर हुए प्रकट
कोई कहता काशी की ब्राह्मणी
की थे वो संतान
पालन-पोषण हुआ
एक जुलाहे के घर
हिन्दू-मुस्लिम फकीरो से
अर्जित किया था ज्ञान
एक ही मानते ईश्वर को
कर्मकाण्ड का करते विरोध
ललकारते पाखंडियो को
ढ़ोगियो पर करते व्यंग्य बान
हो भारत में चर्चा किसी भी भाषा
या हो चर्चा किसी भी संस्कृति की
बिन कबीर की चर्चा के
पूरा न हो सका कोई व्याख्यान
अरबी ,फ़ारसी, बुन्देलखंडी,
पंजाबी ,ब्रजभाषा, खड़ीबोली
इन भाषाओ के शब्द मिलते
इनकी रचनाओ में
पंचमेल खिचड़ी या सधुक्कड़ी भाषा
कहा जाता इनकी बोली को
जिनका न था कही कोई सान
जब मगहर में त्यागी देह
तब हुआ हिन्दू-मुस्लिम विवाद
हिन्दू चाहते हिन्दू रीत से
मुस्लिम चाहते मुस्लिम रीत
से हो अंतिम संस्कार
जब हटाई देह से चादर
तो वहा था फूलो का अम्बार
आधे फूल लिए हिन्दू
करने चले अंतिम संस्कार
आधे फूल लेकर मुस्लिम
ने बनाई उनकी मजार
आज भी पूजते मगहर में
उनकी मजार को
चाहे हिन्दू हो चाहे मुसलमान ।
प्रिया
गुरुवार, 16 अप्रैल 2015
संत कबीर
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