शुक्रवार, 28 अगस्त 2015

राखी

साँझ का वक्त एक तरफ सूरज डूबने को था दूसरी तरफ चाँद अपनी चाँदनी बिखेरने को तैयार था। तारे भी टिमटिमाते हुए अपनी मौजूदगी का अहसास करा रहे थे। पंछी अपने-अपने घोसलों में लौट आये। वही बाकी कर्मचारियों की तरह मनीष भी कारखाने में छुट्टी का साइरन बजने पर अपने घर की तरफ चला।
सारे दिन का थका मनीष हाथ मुँह धो जैसे ही खाना खाने बैठा
नंदिता ने कहा "याद है न कल रक्षाबंधन है।" मनीष के चेहरे पर ख़ुशी और चिंता मिश्रित भाव उभर आये।
"हां याद है।" वह इतना ही कह पाया
"कल मेरा भाई विनोद शाम तक आ रहा है , तो आप सुबह जल्दी ही दीदी से राखी बंधवा लेना ताकि शाम उसके आने तक हम लोग फ्री हो जाए।" नंदिता ने अपना एक तरफ़ा फैसला सुना दिया
मनीष सिर्फ हां के अलावा कुछ नहीं बोल सका इतने में नंदिता फिर बोली "अच्छा सुनो , कल दीदी को नेग क्या दोगे?"
"इस साल मेरी तनख्वाह में बढ़ोतरी हुई है तो सोच रहा हूँ इस साल नेग कुछ बढ़ा दू और साथ ही कुछ फल भी ले चलेगे। वैसे भी साल में दो बार रक्षाबंधन और भाईदूज के दिन ही तो जाना होता है दीदी के घर वैसे कहाँ समय मिल पाता है मुझे भी। और मम्मी के जाने के बाद दीदी भी कहाँ आती है अब यहाँ।" मनीष अपनी लय में बोलता चला गया
"जब फल ले जाने की सोच ही रहे हो तो नेग में बढ़ोतरी क्यों ?"नंदिता ने आँखे तरेरते हुए कहा " एक बात करो या फल या नेग पता भी है आज कल फल कितने महंगे हो गए हैं?"
मनीष नंदिता के इस स्वभाव से भली भांति परिचित था वह जानता था के नंदिता उसकी बात को जरूर काटेगी इसलिए खाली हाथ न जाना पड़े उसने नेग भी बढ़ाने की बात कही। मनीष का मन तो बहुत होता के नंदिता से कहे "मैं कमाता हूँ , मेरी बहने है उनको क्या देना क्या न देना यह सब कहने वाली तुम कौन होती हो।" किन्तु वह नहीं कह पाता क्योंकि उससे कुछ कहना मतलब घर में आठ दिनों की कलह की शुरुवात करना। घर में कोई बड़ा भी न था जिससे वह डरती। मनीष मन मसोसकर रह गया।
दूसरे दिन वही हुआ जो नंदिता ने तय किया था। फल तो ले गए पर नेग में कोई बढ़ोतरी न हुई। शाम को नंदिता का भाई विनोद आया राखी बंधवाकर वह रात की गाडी से ही रवाना भी हो गया।
उसके जाने के बाद नंदिता ने चहकते हुए मनीष को बताया "जानते हो विनोद मुझे कितना प्यार करता है , मेरे लिए कितना कुछ लाया है आज उसने मुझे न सिर्फ पिछले साल से ज्यादा नेग दिया बल्कि मेरे लिए साड़ी भी लाया और साथ ही बच्चों के लिए चॉकलेट और आपके लिए फल भी ले आया है। कितना प्यार करता है मेरा भाई मुझसे। भगवान् ऐसा भाई सबको दे " नंदिता यह सब पाकर ख़ुशी के मारे बोलती गई
अनायास ही मनीष कह उठा "वाकई बहुत प्यार करता है तुम्हारा भाई तुमसे, सच भगवान् ऐसा भाई सबको दे।"

बुधवार, 12 अगस्त 2015

अब तुम बड़े हो गए

वो हंसी वो कहकहे वो मुस्कुराहटें

सब के सब ना जाने कहां खो गए

रह गईं बस उदासी परेशानियां

लोग कहते हैं अब तुम बड़े हो गए

बीत गए  मस्ती भरे वो प्यारे से दिन

वो खेल, वो खिलोने, वो पलछिन

वो बनकर अब इक दास्तां रह गए

लोग कहते हैं अब तुम बड़े हो गए

कागज़ की नाव बारिश में चलाना

न धूप का पता न छाँव का लगना

आज वो नज़ारे जाने कहाँ खो गए

लोग कहते हैं अब तुम बड़े हो गए

दोस्तों का रूठना , रूठकर मानना

अपनी बात की धौंस जमाना

अब वो लम्हे कहाँ सो गए

लोग कहते है अब तुम बड़े हो गए

चश्मा चढ़ा दादी की नक़ल उतारना

पापा की छोड़ी सिगरेट को फुंफकारना

अल्हड़पन की मस्ती में फ़ना हो गए

लोग कहते हैं अब तुम बड़े हो गए

छोटे भाई बहनो के लिए लड़ना

अपनी गलती दूसरों पर मढ़ना

गुस्से में घर से अब हम दूर हो गए

लोग कहते हैं अब तुम बड़े हो गए

वो कंचो के निशानों पर आँखे मोड़ना

जीत जाने पर अपनी अकड़ को जोड़ना

वो अहसास अब न जाने कहाँ खो गए

लोग कहते हैं अब तुम बड़े हो गए

वो मासूम बचपन की कहानियां

थोड़ी नादानियां थोड़ी शैतानियां,

दिन वो प्यारे ये आए और वो गए

लोग कहते है अब तुम बड़े हो गए

साथ जाते हम स्कूल मीत चार

याद आता कितना खास प्यार

सिर्फ अब वो कहानी किस्से हो गए

लोग कहते है कि अब तुम बड़े हो गए

प्यारे दोस्तों का हरपल साथ था

गम में भी ख़ुशी का अहसास था

वो निश्छल दोस्ती के ज़माने खो गए

लोग कहते हैं अब तुम बड़े हो गए

टीफिन में तो भरा प्यार अपार था

मस्ती का ही होता बस खुमार था

वो दिन कहाँ रफू चक्कर हो गए

लोग कहते है अब तुम बड़े हो गए

सोते के कान में चुपचाप रुई घुमाना

भैया बहन की पुस्तक को छुपाना

अब तो ऐसा करने से मन घबराए

लोग कहते है अब तुम बड़े हो गए

खेल खेल में यहाँ वहां छिप जाना

लड़ने के बाद साथ बैठ फिर खाना

दोस्त बहुत पर अब अपना किसे 

लोग कहते है अब तुम बड़े हो गए

दूर हो गए मासूमियत के साये

अल्हड़पन,अबोध वो अठखेलियाँ

वो बेफिक्री के दिन कहीं खो गए

लोग कहते हैं अब तुम बड़े हो गए

बात बात पर निस्वार्थ मुस्कुराना

वो नए वस्त्र पहनकर इठलाना

दोस्तों संग शैतानियों के दिन खो गए

लोग कहते हैं अब तुम बड़े हो गए

जाम तोड़ते  कभी आम पेड़ चढ़ते

छोटी छोटी बात पर थे बहुत लड़ते

वो दिन न जाने कहाँ अब लद गए

लोग कहते है अब तुम बड़े हो गए

वो प्यार हुआ था जो पहली नज़र में

वो रिश्ते बने थे जो बाली उमर में

वक्त के दरिया में वो कहां बह गए

लोग कहते हैं अब तुम बड़े हो गए

वो रातभर सितारों संग जागना

चाँद से महबूब की बाते करना

वो तारे अब ना जाने कहां सो गए

लोग कहते हैं अब तुम बड़े हो गए

चलती क्लास में घूमने का प्रोग्राम बनाना

बहार निकाले जाने पर दोस्तों को बुलाना

वो फिल्मों के शौक न जाने कहां खो गए

लोग कहते हैं अब तुम बड़े हो गए

कॉफी के बहाने दोस्तों संग वक्त बिताते

बेबात की बातो पर ठहाके लगाते

वो हसी वो ठहाके कब गुमनाम हो गए

लोग कहते हैं अब तुम बड़े हो गए

देखे थे कभी कुछ रंगीन से सपने

न जाने अब कहां खो गए वो अपने

सपनो की माला को संजोते रह गए

था जब बचपना सभी से शरमाते थे

ठीक से भी ना हम चल पाते थे

हौसलो ने दी जब ताकत खड़े हो गए

लोग कहते है अब तुम बड़े हो गए

कैसा वो दिलकश रूमानी समां था

उधर तुम हसीं थे इधर दिल जवां था

महल थे जो सपनों के सब ढह गए

लोग कहते हैं अब तुम बड़े हो गए

छज्जे में खड़े होकर तुम बुलाते थे

मुझको न जाने कितना लुभाते थे

न रहे वो बुलावे अब वो कहीं खो गए

लोग कहते है अब तुम बड़े हो गए

वो जो नरम नाजुक से अहसास थे

संग जीने मरने के जो वादे खास थे

वक्त की आंधियो में कहीं खो गए

लोग कहते है अब तुम बड़े हो गए

दूसरों के लिए अब वक्त गवांते है

अब ना होली ना दीवाली मनाते है

सपने दिल के दिल में ही सो गए

लोग कहते हैं अब तुम बड़े हो गए

बालों में अब सफेदी झलकने लगी

रेत  मुट्ठी  से  जैसे  सरकने  लगी

लौट कर आए कब लम्हे जो गए

लोग कहते हैं अब तुम बड़े हो गए

कोई सुनता नहीं अब अपनी बातें

आँखों ही आँखों में कटती है रातें

अपने बच्चे ही अब बेगानेे जैसे हो गए

लोग कहते हैं अब तुम बड़े हो गए।

भरत , प्रिया , एकता , मधुर , दिनेश