मंगलवार, 30 दिसंबर 2014

पूर्णता का आभास

शाम का समय केफै में चहल-पहल थी , अपने लिए बैठने की जगह ढूंढ़ते हुए कामिनी को अचानक एक परिचित सा चेहरा दिखाई दिया , जैसे ही वह उस चेहरे के पास गयी अनायास ही उसके मुंह से निकला "मधुर  तुम ! "
मधुर भी उसे पहचानते हुए बोल पडी " अरे कामिनी तुम यहां ! तुम तो विदेश गयी थी ना आगे की पढाई करने ! "
"हां यार गयी थी और पूरी कर के वापस यहीं आ गयी" मधुर के पास वाली कुर्सी पर बैठते हुए कामिनी ने कहना जारी रखा , " मगर जो अपनापन और सुकून अपने देश में है वह परदेश में कहां ! इसलिए यहीं पर एक कंपनी में अच्छे पद पर हूं , अच्छा कमाती हूं "
"पतिदेव क्या करते हैं ? और बच्चे कितने हैं  ?" मधुर ने पूछा
"नहीं यार सोचा पहले करियर से बना लूं अभी पति , बच्चों की जिम्मेदारी और घर के बंधनो में नहीं बंधना चाहती ,अभी आजाद पंछी हूं , जब चाहूं कहीं भी आ जा सकती हूं कोई रोक-टोक नहीं , तुम सुनाओ ! माथे पर चाँद सी गोल बिंदीया , चमकता सिंदूर , कंगन , साडी पहने हुए पूरी भारतीय नारी लग रही हो , कितने बच्चे हैं ?"
मधुर मुस्करा कर कहने लगी " दो बेटीयां हैं , पति बिजनस मैन हैं ।"
"और तुम ? तुम क्या करती हो ?" कामिनी ने पूछा
"मैं ,घर संभालती हूं , हाऊस वाईफ हूं , शापिंग करते हुए थक गयी तो यहां काफी पीने बैठ गयी " मधुर ने बुझे स्वर में कहा
बातों -बातों में विदाई लेने का समय आ गया दोनो ने फिर मिलने का वादा करते हुए विदा ली ।
उस दिन से मधुर कुछ बुझी-बुझी सी रहने लगी थी सोचती कितनी आजाद है ना कामिनी , न घर की न बच्चों की जिम्मेदारी , न कोई रोकने -टोकने वाला कितनी शानदार जिंदगी है ।
कुछ दिनों बाद अचानक घर के दरवाजे पर कामिनी को देखकर मधुर ने हैरानी और उत्सुकता से उसका स्वागत किया "आज अचानक कैसे आना हुआ ?"
"सच कहूं मधुर ! तो उस दिन तुम्हें पूर्ण भारतीय नारी के रूप में देखकर मुझे बहुत खुशी हुई और अपनी कमी का अहसास भी , ये भी कोई जिंदगी है न कोई पूछने वाला कि खाना खाया कि नही! न कोई बोलने वाला, कितना भी करियर क्यूं न बना लूं मगर परिवार की कमी कोई नहीं पूरी कर सकता , इसलिए जिस लड़के से प्यार करती थी उसी से अगले हफ्ते शादी कर रही हूं ,  तुझे अपने पूरे परिवार के साथ आना है !"
"हां जरूर आऊँगी , यह भी कोई कहने की बात है !" कहते हुए मधुर की आँखों में चमक आ गयी थी ,उसे अब अहसास हो गया था कि कामिनी की जिस आजादी को देखकर उसे खुद से शिकवा था वह आजादी नहीं बल्कि अधूरापन था , परिवार के बिना कैसी पूर्णता ।
प्रिया वच्छानी

गुरुवार, 25 दिसंबर 2014

परिवार

परिवार कितना सुंदर और खुद में एक पूर्णता लिये हुए शब्द है , मगर आज कल हर एक के लिए इस शब्द के मायने बदलते जा रहे है , आज के युग में परिवार मतलब मैं , मेरी पत्नी /पति और बच्चा इसमें बाकी परिवार का समावेश नहीं होता , आज कल दादा-दादी , चाचा-चाची ,ताऊ-ताई रिश्तेदार हो गये हैं परिवार नहीं  ,चचेरे , फूफेरे , ममेरे भाई -बहन सब कजिन हो गये हैं वह भाई -बहन नहीं ।
कितना अच्छा होता था  पहले जब पूरा परिवार आपके साथ होता , सुख में दुख में हर वक्त सब साथ होते ,कभी किसी को अकेलेपन का अहसास नहीं होता , चाहे आप माँ-बाप की अकेली संतान हों तब भी भाई-बहन की कभी कमी नहीं महसूस होती क्योंकि चचेरे ममेरे सब भाई-बहन ही होते थे , साथ ही बच्चों में संस्कार खुद ही आने लगते , बडों की इज्जत करना , छोटो को प्यार देना , हम उम्र से अपनापन , घरवालों का ख्याल रखना यह सब संयुक्त परिवारों के बच्चों को सिखाना नहीं पड़ता , बच्चे घरवालों को देखते हुए खुद ब खुद सीखते हैं ।
अगर आपके घर किसी संयुक्त परिवार का बच्चा आए और आप उसे चाकलेट दो तो वह अपने बाकी सारे भाई-बहनों के लिए भी मांगेगा , गर आप उसे ना भी दें तब भी वह अपनी चाकलेट उनसे बांटकर खाएगा अकेला नहीं , क्योंकि संयुक्त परिवार के बच्चे यही सीखते हैं मिलकर रहना और बांटकर खाना । वहीं बच्चे अपने घर के बुजुर्गों से भी जुड़े रहते हैं जिससे उनमें संस्कार भी आसानी से आ जाते हैं क्योंकि जब वो अपने दादा-दादी के साथ होते हैं तब वह उन्हें न सिर्फ कहानीयों के रूप में अपनी धार्मिक बातों अवगत कराते हैं , बल्कि अपनी जिंदगी के खट्टे-मीठे अनुभव भी बताते हैं जिससे बच्चा न सिर्फ अपने रीति रिवाज सीखता है बल्कि बुजुर्गों के अनुभवों से उन्हें जिंदगी के महत्वपूर्ण फैसले लेने में भी काफी मदद मिलती है व समय आने पर  बडों का मार्गदर्शन भी मिलता है ।
     मगर आज-कल जिस तरह एकल परिवारों का चलन बढ़ता जा रहा है यह बहुत ही चिंता का विषय है ,यह न सिर्फ बच्चों के मानसिक स्तर पर असर कर रहा है बल्कि पति-पत्नी के रिश्तों में भी दरार की वजह बन रहा है , क्योंकि जहां सांझा परिवारों में जिम्मेदारियां बंट जाती थी वहीं अब एकल परिवारों में सारी जिम्मेदारियां खुद निभानी पड़ती हैं , जिसके चलते कभी-कभी पति-पत्नी दोनों को कमाने के लिए घर से बाहर निकलना पड़ता है ,साथ ही  तनाव का स्तर इतना ज्यादा बढ़ जाता है कि छोटी बात भी झगड़े का कारण बन जाती है , और वही तनाव कारण बनता है बीमारियों का भी , आज के युग में ब्लड प्रेशर , शुगर जैसी बीमारियां तो जैसे आम हो गयी हैं ।
वहीं दूसरी तरफ कमाने के चक्कर में बच्चों को क्रश यां काम वाली बाई के हवाले छोड़ दिया जाता है , अब आप खुद सोचीये बच्चे को जो संस्कार घर के बुजुर्ग देते हैं वो काम वाली बाई दे पाएगी ???
   बच्चों की मानसिकता पर इसका बहुत बुरा असर पड रहा है शायद इसी वजह से आज अपराध बढ़ते जा रहे हैं , आज के बच्चों से आप एकलव्य वा श्रवण कुमार के बारे में पूछेंगे तो वो शायद ही आपको बता पाएं यहां तक कि वो अपने रिश्तेदारों को भी ठीक से नहीं पहचानते यह बहुत गंभीर विषय है , माना कि संयुक्त परिवारों में थोड़ा  बलिदान भी देना पड़ता है , थोड़ी रोक टोक होती है, मगर थोड़ा सा देकर अगर हमें बहुत कुछ मिले , हमारे बच्चों को संस्कार मिले तो थोड़ा सा सामंजस्य बिठाकर चलने में क्या बुराई है ।
प्रिया वच्छानी

गुरुवार, 18 दिसंबर 2014

लेख

पाकिस्तान में हुए 16/12 के हमले की जितनी भर्त्सना की जाये उतनी कम है, छोटे मासूम बच्चों को मारना न सिर्फ़ कमजोर मानसिकता को दर्शाता है , अपितु ऐसे लोगों की नपुंसकता को भी जाहिर करता है ,यह एक घटिया सोच ही तो है जिसमें वह बदले की भावना में इतने अंधे हो गये कि उन्होंने बच्चों को अपना निशाना बनाया । इस हमले से न सिर्फ पाकिस्तान बल्कि पूरे देश में शोक की लहर फैली है , ऐसा कोई व्यक्ति न होगा जिसकी आँखें नम न हुई हों , यां जिसने संतावना न जाहिर की हो ।
मगर अफसोस तब यह देखकर ज्यादा हुआ कि कुछ लोगों ने अफसोस तो जताया मगर उनकी बातों में तल्लखी साफ झलक रही थी किसी धर्म विशेष को लेकर, पर क्या यह सही समय है अपनी नाराजगी दिखाने का ? अफसोस जताने के साथ ताने मारने का ? मुझे तो यह बहुत बुरा लगा .....
मगर मैं ऐसी किसी बहस में नहीं पड़ना चाहती ,क्योंकि हर व्यक्ति के अपने -अपने विचार होते हैं , और यह एक ऐसा मुद्दा है जिसपर जितनी बहस की जाये कम है ! क्योंकि हर किसी के पास अपने तर्क हैं देने के लिए । मगर मैं हर धर्म में विश्वास रखने वाले लोगों में से हूं , मैं अपने धर्म को अच्छा मानती हूं ,मगर यह हक मुझे नहीं कि मैं सामने वाले के धर्म को खराब कहूं ।
दोस्तों , खराब कोई धर्म नहीं होता , हत्या करना , किसी को मारना यह कोई धर्म नहीं सिखाता । खराब होती है ऐसे लोगों की सोच , खराब होते हैं ऐसी मानसिकता वाले लोग जो ऐसा कृत्य कर जाते हैं , लेकिन कुछ खराब लोगों की वजह से सारे धर्म को गलत ठहराना कहां तक उचित है ?
मुझे लगता है कि यह तो वही बात हुई कि एक माँ के बच्चे हैं , एक शरारत कर के भाग जाता है तो कहा जाता है कि वो जब हाथ लगेगा तब उसे तो मार पडेगी ही मगर तब तक दूसरे बच्चों को डांट फटकार लो , क्यूं ? क्योंकि वह भी तो उसका भाई है और सब मिले हुए हैं ।मगर यह कहां तक उचित है ? इसका दूसरा असर यह पडेगा कि दूसरे बच्चे भी सोचने लगते हैं कि डांट फटकार तो पड़नी ही है चाहे शरारत करें यां न करें , तो शरारत न करके डांट खाने से बेहतर है शरारत कर के डांट खा लें , और इस चक्कर में दूसरा भी शरारती हो जाता है , जो कि गलत है । जानती हूं जहां कुछ लोग मेरी इस बात से सहमत होंगे वहीं कुछ लोग मुझ से इत्तेफाक भी रखेंगे , मगर बात फिर वही कि सोच अपनी-अपनी , आज आप लोगों को मेरी जिंदगी की एक सच्ची घटना सुनाती हूं ।
मुंबई में हुए 1993 के दंगों के बारे में कौन नहीं जानता ! बाम्ब ब्लास्ट के बाद हिंदू मुस्लिम के झगड़ों ने दौड़ती-भागती हुई मुंबई की की रफ्तार को जैसे रोक दिया था , जिसमें कई बेकसूर लोग मारे गये थे , उन्हीं दिनो की बात है मेरे चाचाजी जिनकी दुकान मनीष मार्केट में थी , जहां से लगभग सारे धर्म के लोग अपना कारोबार चलाते हैं , दंगों के चलते कुछ दिनो से चाचाजी दुकान पर नहीं जा पाये थे इसलिए जब एक दिन थोड़ा माहौल शांत होने की खबर मिली तो उन्होंने दुकान पर जाने का फैसला किया ,कि देख आऊं दुकान का क्या हाल है , जब वहां पहुंचे तो देखा कुछ और आस-पास की दुकानों के मालिक भी वहीं थे ,और वह यह सोचकर थोड़ा निश्चिन्त भी हुए के जानने वाले लोग हैं कई बार बार साथ बैठकर खाना भी खाया है तो अगर कोई दिक्कत हुई तो मेरा साथ देंगे , बहरहाल वह अपनी दुकान खोलकर साफ सफाई में जुट गये , मगर वहां जो लोग खडे थे उनमें से तीन लोग बाहर जा कर बातें करने लगे चाचाजी को यह  सब नारमल सा लगा वह अपने काम में लगे रहे कि सहसा उनमें से एक वापस आया और धीमी आवाज़ में बोला " प्रकाश भाई आप इस तरफ से सीधा बाहर भागीये , दुकान की चिंता मत कीजिये मैं बंद कर दूंगा ।"
चाचाजी असमंजस में पड़ गये कि अचानक ये ऐसा क्यूं कह रहे है ! और इस तरह भरी हुई दुकान को कोई कैसे खुला रखकर भागे ?
मगर उस नेक बंदे ने चाचाजी के परेशानी के भावों को समझ लिया और कहा " भाई जान सलामत रही तो पैसे और कमा लोगे गर वो ही न रही तो पैसे किस काम आएंगे ? यह जो बाहर दो लोग बात कर रहे हैं उनका सोचना है कि वैसे भी दंगे चल ही रहे हैं इस माहौल में किसने किसे मारा क्या पता चलेगा ! तो क्यूं ना आपको मारकर आपकी दुकान लूट ली जाये ! इन लोगों ने शायद कुरान शरीफ ठीक से नहीं पडा , और इन्हें खुदा का डर नहीं मगर मुझे है , आप बस अपनी जान बचाकर भागीये दुकान मैं संभाल लूंगा मगर , अगर इन्होंने अपने जैसे कुछ और लोगों को बुला लिया तो मैं कुछ नहीं कर पाऊंगा ।"
चाचाजी के पास अब कुछ सोचने का समय नहीं था उन्होंने उस नेक बंदे को शुक्रीया कहा व दूसरी तरफ से भागकर एक बस में चढ़ गये , किसी तरह वह सही सलामत घर पहुंचे ।
जब दंगे पूरी तरह से शांत हुए और शहर वापस अपनी रफ्तार में आया तब वह फिर गये अपनी दुकान पर वहां न सिर्फ दुकान ठीक से बंद थी बल्कि सारा सामान भी सही सलामत था , चाबी देते हुए उस नेक बंदे ने कहा " भाई कोई धर्म खराब नहीं होता , उसे खराब करने वाले होते हैं कुछ लोग , कुछ परिस्थितियां ,इसलिए अपने मन में किसी धर्म विशेष के खिलाफ कोई धारणा मत पालना ।
मगर यहां मारने वाला भी विशेष धर्म का था तो बचाने वाला भी उसी धर्म का था अब किसे सही और किसे गलत ठहराया जाये !
यह मैंने आपको अपने जीवन की एक सच्ची घटना बतायी है , और कल तो पाकिस्तान के हमले में मारने वाला भी उसी धर्म का था और मरने वाले बच्चे भी उसी धर्म के थे , तब आप किसे गलत करार कर सकते हैं ?
मित्रों अब यह आप पर निर्भर करता है कि आप किसी धर्म को गलत समझते हैं यां व्यक्ति को ।
प्रिया वच्छानी

सोमवार, 15 दिसंबर 2014

रिश्ता ऐसा भी.......

"बताईये ना डाक्टर साहब अब संजय कैसै हैं ? " भराई हुई आवाज़ में नीता ने पूछा
"देखिये हमने अपनी पूरी कोशिश कर ली , अब आगे जो भगवान की मर्जी " कहकर डाक्टर चला गया ।
नीता और संजय की शादी को अभी कुछ दिन ही हुए थे, संजय अपनी मोटर साईकल से जा रहा था ,तभी अचानक पीछे तेज रफ्तार से आती हुई कार ने टक्कर मार दी , कई फुट ऊपर उछलकर गिरे थे संजय । कार वाला तो भाग गया मगर वहां भीड़ में से किसी सज्जन ने उसे अस्पताल पहुंचाया ।
   सारे रिश्तेदारों का आना जाना शुरू हो गया, वह सब माँ से तो सांत्वना जताते मगर नीता को गुनहगार की दृष्टि से देखते , कई लोगों को माँ जी से यह कहते भी सुना कि नीता मनहूस निकली संजय के लिए । यह सब सुनकर अंदर से टूट सी गयी नीता ।
उसने मन ही मन एक निश्चय किया और सास के पास गयी ,
"माँजी मैं आपसे कुछ कहना चाहती हूं " नीता सास के पास वाली कुर्सी पर बैठते हुए बोली
"कहो बहू , क्या बात है ?" माँजी हैरानी से नीता की तरफ देख रही थी
नीता के गले से शब्द अटक -अटक कर निकल रहे थे " माँजी संजय की इस हालत के लिये मैं जिम्मेदार हूं , शायद मैं उनके लिये मनहूस हूं इसलिए आज संजय की यह हालत है , मगर माँजी एक बार संजय ठीक होकर चलने फिरने लगें मैं वादा करती हूं मैं खुद उनकी जिंदगी से दूर चली जाऊंगी , बस उनके ठीक होने तक मुझे उनके साथ रहने दें ।" नीता के हाथ विनती की मुद्रा में जुड़े हुए थे व आँखों से अविरल अश्क बहे जा रहे थे ,
"यह क्या कह रही हो बहू ?" माँजी ने नीता के हाथों को अपने हाथों में लेते हुए कहा ,"क्यूं ऐसा सोच रही हो ?
"अरे पगली , लोगों को तो मौका चाहिये बोलने का ,मगर यह हम पर निर्भर करता है कि हम कितनी उनकी बात सुनते हैं , और मेरी सोच इतनी छोटी नहीं कि बेटे के साथ घटी दुर्घटना का दोष बहू को दूं , इसमें तुम्हारी क्या गलती ? "
माँजी नीता के आँसू पोचते हुए बोली " फिक्र ना करो बहू संजय जल्द ठीक हो जायेगा मुझे भगवान पर पूरा भरोसा है , जब हमने किसी का बुरा नहीं किया तो हमारे साथ क्यूं बुरा होगा ?"
नीता सास के गले लगते हुए बोली " आज आपके रूप में मुझे मेरी माँ वापस मिल गयी ।"
नीता जी जान लगाकर संजय की सेवा करने लगी, तब भगवान को भी उनके  प्यार और सेवा के सामने झुकना पडा ।