गुरुवार, 18 दिसंबर 2014

लेख

पाकिस्तान में हुए 16/12 के हमले की जितनी भर्त्सना की जाये उतनी कम है, छोटे मासूम बच्चों को मारना न सिर्फ़ कमजोर मानसिकता को दर्शाता है , अपितु ऐसे लोगों की नपुंसकता को भी जाहिर करता है ,यह एक घटिया सोच ही तो है जिसमें वह बदले की भावना में इतने अंधे हो गये कि उन्होंने बच्चों को अपना निशाना बनाया । इस हमले से न सिर्फ पाकिस्तान बल्कि पूरे देश में शोक की लहर फैली है , ऐसा कोई व्यक्ति न होगा जिसकी आँखें नम न हुई हों , यां जिसने संतावना न जाहिर की हो ।
मगर अफसोस तब यह देखकर ज्यादा हुआ कि कुछ लोगों ने अफसोस तो जताया मगर उनकी बातों में तल्लखी साफ झलक रही थी किसी धर्म विशेष को लेकर, पर क्या यह सही समय है अपनी नाराजगी दिखाने का ? अफसोस जताने के साथ ताने मारने का ? मुझे तो यह बहुत बुरा लगा .....
मगर मैं ऐसी किसी बहस में नहीं पड़ना चाहती ,क्योंकि हर व्यक्ति के अपने -अपने विचार होते हैं , और यह एक ऐसा मुद्दा है जिसपर जितनी बहस की जाये कम है ! क्योंकि हर किसी के पास अपने तर्क हैं देने के लिए । मगर मैं हर धर्म में विश्वास रखने वाले लोगों में से हूं , मैं अपने धर्म को अच्छा मानती हूं ,मगर यह हक मुझे नहीं कि मैं सामने वाले के धर्म को खराब कहूं ।
दोस्तों , खराब कोई धर्म नहीं होता , हत्या करना , किसी को मारना यह कोई धर्म नहीं सिखाता । खराब होती है ऐसे लोगों की सोच , खराब होते हैं ऐसी मानसिकता वाले लोग जो ऐसा कृत्य कर जाते हैं , लेकिन कुछ खराब लोगों की वजह से सारे धर्म को गलत ठहराना कहां तक उचित है ?
मुझे लगता है कि यह तो वही बात हुई कि एक माँ के बच्चे हैं , एक शरारत कर के भाग जाता है तो कहा जाता है कि वो जब हाथ लगेगा तब उसे तो मार पडेगी ही मगर तब तक दूसरे बच्चों को डांट फटकार लो , क्यूं ? क्योंकि वह भी तो उसका भाई है और सब मिले हुए हैं ।मगर यह कहां तक उचित है ? इसका दूसरा असर यह पडेगा कि दूसरे बच्चे भी सोचने लगते हैं कि डांट फटकार तो पड़नी ही है चाहे शरारत करें यां न करें , तो शरारत न करके डांट खाने से बेहतर है शरारत कर के डांट खा लें , और इस चक्कर में दूसरा भी शरारती हो जाता है , जो कि गलत है । जानती हूं जहां कुछ लोग मेरी इस बात से सहमत होंगे वहीं कुछ लोग मुझ से इत्तेफाक भी रखेंगे , मगर बात फिर वही कि सोच अपनी-अपनी , आज आप लोगों को मेरी जिंदगी की एक सच्ची घटना सुनाती हूं ।
मुंबई में हुए 1993 के दंगों के बारे में कौन नहीं जानता ! बाम्ब ब्लास्ट के बाद हिंदू मुस्लिम के झगड़ों ने दौड़ती-भागती हुई मुंबई की की रफ्तार को जैसे रोक दिया था , जिसमें कई बेकसूर लोग मारे गये थे , उन्हीं दिनो की बात है मेरे चाचाजी जिनकी दुकान मनीष मार्केट में थी , जहां से लगभग सारे धर्म के लोग अपना कारोबार चलाते हैं , दंगों के चलते कुछ दिनो से चाचाजी दुकान पर नहीं जा पाये थे इसलिए जब एक दिन थोड़ा माहौल शांत होने की खबर मिली तो उन्होंने दुकान पर जाने का फैसला किया ,कि देख आऊं दुकान का क्या हाल है , जब वहां पहुंचे तो देखा कुछ और आस-पास की दुकानों के मालिक भी वहीं थे ,और वह यह सोचकर थोड़ा निश्चिन्त भी हुए के जानने वाले लोग हैं कई बार बार साथ बैठकर खाना भी खाया है तो अगर कोई दिक्कत हुई तो मेरा साथ देंगे , बहरहाल वह अपनी दुकान खोलकर साफ सफाई में जुट गये , मगर वहां जो लोग खडे थे उनमें से तीन लोग बाहर जा कर बातें करने लगे चाचाजी को यह  सब नारमल सा लगा वह अपने काम में लगे रहे कि सहसा उनमें से एक वापस आया और धीमी आवाज़ में बोला " प्रकाश भाई आप इस तरफ से सीधा बाहर भागीये , दुकान की चिंता मत कीजिये मैं बंद कर दूंगा ।"
चाचाजी असमंजस में पड़ गये कि अचानक ये ऐसा क्यूं कह रहे है ! और इस तरह भरी हुई दुकान को कोई कैसे खुला रखकर भागे ?
मगर उस नेक बंदे ने चाचाजी के परेशानी के भावों को समझ लिया और कहा " भाई जान सलामत रही तो पैसे और कमा लोगे गर वो ही न रही तो पैसे किस काम आएंगे ? यह जो बाहर दो लोग बात कर रहे हैं उनका सोचना है कि वैसे भी दंगे चल ही रहे हैं इस माहौल में किसने किसे मारा क्या पता चलेगा ! तो क्यूं ना आपको मारकर आपकी दुकान लूट ली जाये ! इन लोगों ने शायद कुरान शरीफ ठीक से नहीं पडा , और इन्हें खुदा का डर नहीं मगर मुझे है , आप बस अपनी जान बचाकर भागीये दुकान मैं संभाल लूंगा मगर , अगर इन्होंने अपने जैसे कुछ और लोगों को बुला लिया तो मैं कुछ नहीं कर पाऊंगा ।"
चाचाजी के पास अब कुछ सोचने का समय नहीं था उन्होंने उस नेक बंदे को शुक्रीया कहा व दूसरी तरफ से भागकर एक बस में चढ़ गये , किसी तरह वह सही सलामत घर पहुंचे ।
जब दंगे पूरी तरह से शांत हुए और शहर वापस अपनी रफ्तार में आया तब वह फिर गये अपनी दुकान पर वहां न सिर्फ दुकान ठीक से बंद थी बल्कि सारा सामान भी सही सलामत था , चाबी देते हुए उस नेक बंदे ने कहा " भाई कोई धर्म खराब नहीं होता , उसे खराब करने वाले होते हैं कुछ लोग , कुछ परिस्थितियां ,इसलिए अपने मन में किसी धर्म विशेष के खिलाफ कोई धारणा मत पालना ।
मगर यहां मारने वाला भी विशेष धर्म का था तो बचाने वाला भी उसी धर्म का था अब किसे सही और किसे गलत ठहराया जाये !
यह मैंने आपको अपने जीवन की एक सच्ची घटना बतायी है , और कल तो पाकिस्तान के हमले में मारने वाला भी उसी धर्म का था और मरने वाले बच्चे भी उसी धर्म के थे , तब आप किसे गलत करार कर सकते हैं ?
मित्रों अब यह आप पर निर्भर करता है कि आप किसी धर्म को गलत समझते हैं यां व्यक्ति को ।
प्रिया वच्छानी

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