गुरुवार, 5 नवंबर 2015

सम्मान वापसी

खरबूजे को देखकर जैसे खरबूजा रंग बदल रहा है
वैसे ही सम्मान वापस करने का नया दौर चल रहा है

साहित्यकार फिर वैज्ञानिक अब अभिनेता इस राह आये हैं
चाटुकारिता से पाया था जो सम्मान वह लौटाने आये हैं

क्या सचमुच साम्प्रदायिकता की ऐसी आँधी आई है!
या यह नोटँकी विपक्षी दलों और मीडिया द्वारा फैलाई है!

क्या इतने दंगे हो रहे जो कोई और राह न दी दिखालायी है!
या फिर देश की तरक्की, अमन, शान्ति इनको रास न आई है !

ऐसा नहीं इतने सालों में देश में कोई ऐसी घटना न घटित हुई
पर अब तक इनका ज़मीर क्यों न जागा था सोचकर मैं चकित हुई

एक दादरी की बात पर इन बुद्धिजीवीयों नें इतना शोर मचा लिया
हुए कश्मीरी पंडित जब बेघर तब क्यों था मुँह में दही जमा लिया

हो साहित्यकार,वैज्ञानिक या अभिनेता इसी देश का खाते हैं
फिर क्यों आज एक पक्ष का सोचकर ज़हर उगल दिखाते हैं

वापस है लौटाता अपना सम्मान आज यह हकला इंसान
जिसनें कहा था मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही जाऊँगा पाकिस्तान 

क्या हम नहीं जानते कैसे बन गए हो तुम इतने महान
क्यों ऐसी हरकतें कर तुम खुलवाते हो हमारी जुबान

माना लोकतंत्र है तुम बेहिचक मन की बात बोल सकते हो
पर क्या बोलना है, खुद भी तोअपने शब्दों को तोल सकते हो

चुपचाप जो काम आज तक करते हो वो तुम करते जाओ
देश का नमक खा कर देश से गद्दारी तो न कर दिखलाओ।
प्रिया

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