मंगलवार, 5 मई 2015

माँ

      माँ

देखा था कई बार मैंने उनको,
भीगी पलकों में मुस्कुराते
हसते हुए कई बार,
अपना दर्द सबसे छुपाते
चुपचाप सुनती रहती,
बातें वह सबकी
फिर भी देखा उनको,
सबपर सदैव प्रेम लुटाते
कभी न की शिकायत
किसी आभाव की
कभी न किया विरोध,
किसी अन्याय का
कभी सास, कभी ननद,
कभी पति के ताने
सुनकर भी अनसुना कर
वो चलती रहती अविरल सी
बिना अपने चेहरे पर
कोई शिकन लाये
मैं ही बिफर उठती,
कभी पूछती सवाल
क्यों चुपचाप सब, सहती हो माँ ?
क्यों सब सुनकर भी
अनसुना कर प्रेम धारा बन
बहती हो माँ ?
माँ उस समय भी केवल मुस्कुराती
कहीं अंदर ही अंदर
अपना दर्द छुपाती
कहती जब तुम बड़ी हो जाओगी
तब सब समझ जाओगी
जब हुई मैं बड़ी,
शादी सर पर आ पड़ी
तब माँ ने उन रहस्यों से
पर्दा एक दिन उठाया
और बड़े प्यार से तब
मुझे उन्होंने समझाया
औरत का जीवन इतना
आसान नहीं होता
बिन संघर्ष कोई
महान नहीं होता
दूसरों के लिए जीना ही
औरत का नाम है
पति, बच्चे,घरवालों की
ख़ुशी में खुश होना
औरत का एकमात्र काम है
धरती सी सहनशीलता रख
रिश्तों को सहेज संभालकर रखना
अंतस मन की पीड़ा को दबाकर
निरंतर प्रेम धारा बरसाना ही
औरत का दूसरा नाम है
गर्व होता अब मुझे खुद पर
मैं भी तुम्हारी तरह हो गई हूँ माँ
तुम्हारी ही तरह झूठी जिंदगी जीना
मैं भी अब सीख गई हूँ माँ
भीगी पलकों से अब
मैं भी मुस्कुराती हूँ
किसी को न अपना दर्द सुनाती हू
गर हो गई कभी इंतेहा दर्द की
तो आँखे बंद कर सपनो में
मैं तुम्हारी गोद में सो जाती हू
मन ही मन बता देती हू तुम्हे सारे दर्द
अपने सर पर तुम्हारे हाथो का
प्यार भरा स्पर्श तब पाती हूँ
आ जाती है एक नयी उमंग सी मुझ में
फिर मुस्कुराते हुए इस झूठी दुनिया का
सामना करने तैयार हो जाती हू ।

प्रिया

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