आज का युग नारी का युग कहलाया जाता है। आज महिलाये हर क्षेत्र में अपना नाम कमा रही है। वह न सिर्फ अच्छी तरह से घर व बच्चे संभालती है बल्कि पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर बाहरी काम भी बखूबी संभालती हैं। फिर वह चाहे कोई भी क्षेत्र हो ।
किन्तु एक बात पर आज भी अफ़सोस होता है । आज के युग में भी कई लोगों की मानसिकता औरतों के प्रति नहीं बदली है। वह आज भी उन्हें दबाकर रखने में , उन्हें नीचा दिखाने में ही अपनी मर्दानगी समझते है। और जब कभी विरोध किया जाए या उन्हें उनकी गलती का अहसास दिलाया जाए तब उनका यह तर्क होता है।" हम क्या नया कर रहे है, कई युगों से यह चलता आ रहा है । कवि तुलसी दास जी भी कह गए है । "
"ढोल, पशु , शूद्र व नारी , ताडन के अधिकारी"
दोस्तों यही बात एक दिन किसी जगह चर्चा का विषय बनी थी। जहां हर कोई अपने तर्क रख रहा था । मगर मैं एक सज्जन के द्वारा दिए गए तर्कों से इतनी प्रभावित हुई कि आप सब लोगो से यह बात बांटे बिना न रह सकी। उन सज्जन का नाम विनोद उपाध्याय है ।
जब वहां किसी ने इसी तरह कवी तुलसीदास जी के दोहे का उदाहरण दिया तब विनोद भैया ने इस दोहे का उदाहरण कुछ इस तरह दिया
जहां उन्होंने तुलसी के ताडन शब्द की विस्तार से व्याख्यान की -
स्त्री पशु आदि के बारे में तुलसी की चौपाई का विश्ललेषण पुरूषप्रधान समाज के पुरोहितों ने अपनी सुविधा के अनुसार की है ।ताडन शब्द का चालाकीपूर्ण ब्याख्या की है।
वस्तुत:तुलसी ने पूरा मानस अवधी बोली में रचा है। अवधी में ताडन शब्द का आशय देख - भाल से होता है ।
उदाहरण के तौर पर
मैं स्वयं अवध का हूं ।बचपन में मैं भी जानवर अवधी में गोरू कह सकते हैं चराने जाता था। एक दिन पानी पीने मुझे घर जाना था ।थोडी दूर पर मेरा दोस्त चंदर पिल्लू खेल रहा था । अपनी जगह से मैने चिल्लाकर कहा - हे चन्दरवा ! हम पानी पियै बरे रचिके घरे जात अही कुछ देर हमरौ गोरूअन ताडे रहे।
गोया तुलसी ने इन सबों को अचछी तरह देख भाल का अधिकारी कहा है। वरना बेतरतीब से ढोल कोया शूद्र को पीट कर देख लें ढोल फूट जाएगी ।या शूद्र बिदक जाएगा
अत: ताडन के संदर्भ में बिचार बदलने की जरूरत है और विचार बदलते ही आप पाएगे कि औरत की परिभाषा भी बदल जाएगी।
ढोल चमडे से मिढी एक नाजुक वाद्य है।पहले के समय में ढोल बजाने वाले अपनी ढोल को बडी जतन से रखते थे।मेंरे पिता जी भी ढोल के अच्छे बादक थे।वे अपनी ढोल को हम लोगों की पहुंच से दूर ऊपर खूंटी पर टांग कर रखते ।हर १५ दिनों में उसके चमडों पर कोल्हू का पूरा सरसों का तेल लगाकर कुछ देर धूप में रखते थे।क्या सुर निकलता था उनकी ढोल से ।फागुन में चौताल केगीत वाले चलता की ताल पर धिगनिक धिगनिक धिगनिक बोलती उनकी ढोल जब चलती तो सुनने वाले दांतों तले उगली दबा लेते।बडी मधुर आवाज थी उनके ढोलक की।वो आवाज आज प्लास्टिक मिढी ढोल में कहां ?
एक दिन बाबू की वही ढोल धूप में सूखती हम लोगों की पहुंच में मिल गयी। मै और में रा चचेरा भाई बांस की कैनी लेकर ढोल को तडा तड तड तड थडा तड अपने ढंग से खूब बजाये , तब तक बजाए जब तक ढोल फूट नहीं गयी।उस दिन हम लोगों पर बाबू की बडी मार पडी थी।
आशय यह कि वे अपने ढोल का निरंतर ताडन(देखभाल) करते थे तो उसमे मधुर आवाज थी। हम बच्चों ने उसका ताडन(पिटाई)किया तो वह भी चटक गयी पिटान पडी वह हमारे किए का परिणाम था।
अब गंवार और शूद्र के संदर्भ में...
गंवार से आशय मूर्ख से है। यही स्थिति तब के कथित शूद्रों की भी होती थी ।तालुकदार लोग अपने यहां जमीन देकर उन्हे रखते थे ।उनकी जरूरतें पूरी करते रहते ,तब जाकर उनका वे ढंग से काम भी करते। जो जमीदार ऐसा नहीं करता उन्हे आता देख ये भी भाग लेते। मार पिटाई करने पर तो उनका गांव ही छोड देते।
नारी के बारे में क्या उद्धरण दूं ?
बस इतना ही की ताडन का अर्थ मार पिटाई से लगाने वाले मित्र बस कल्पना करके देख लें कि वे महज तीन दिन अपनी अपनी नारियों का ताडन(मार पिटाई) करेगे। परिणाम की भी कल्पना ही करके फिर बतायें ।
सच दोस्तों आज तक मैंने अपने जीवनकाल में कभी तुलसी जी के दोहे की ऐसी व्याख्यान नहीं सुनी थी । नमन विनोद भैया ।
प्रिया वच्छानी
शनिवार, 30 मई 2015
ताडन शब्द की व्याख्यान
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