प्रियांश
मंगलवार, 22 अगस्त 2023
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गुरुवार, 13 अक्टूबर 2022
चाय
सोमवार, 29 अप्रैल 2019
बस ! और नहीं
नेहा जल्दी-जल्दी तैयार होने लगी। साड़ी ठीक करते हुए माथे पर मैचिंग बिंदी लगाई, खुद को आईने में दाएं-बाएं देखकर पर्स उठा बाहर किचन की तरफ आ गई
"कितनी देर हो गई आज" टेबल से नाश्ते की प्लेट और चाय के कप उठाती खुद से ही बड़बडाती जा रही थी। "एक तो आजकल यह काम वाली बाईयों के नखरे इतने बढ़ गए हैं कि पूछो मत" टिफिन पर्स में डालते हुए नेहा बाहर निकली । मेन सड़क से ऑटो पकड़ ऑफिस पहुची
नेहा मुंबई के एक मशहूर काउंसलर के यहां रिसेप्शनिस्ट की जॉब पर थी। जिस वजह से कई बार वह मॉडल और एक्ट्रेस से मिलती रहती । वो सदैव सोचती "ये लोग इतने पैसे वाले, खुले विचारों वाले, इतना नाम, शौहरत फिर इन लोगो को किस बात की इतनी चिंता होती है जो इन्हें कॉउंसलिंग की जरूरत पड़ती है ?
पर कभी किसी से पूछने की हिम्मत न हुई । आखिर नोकरी जाने का खतरा भी तो था
शाम को घर आकर कपड़े बदल अभी लेटी ही थी इतने में डोर बेल बजी। दरवाजे पर मनीष था
"आज बहुत थक गया । ऑफिस में इतना काम होता है ना उफ्फ्फ ....और यह बॉस लोग भी ना, तनख्वाह तो एक आदमी की देंगे पर काम इनको दो लोगों का चाहिए "। ऑफिस का बैग एक तरफ पटकते हुए "नेहा जरा बढ़िया सी चाय बना दो मैं फ्रेश होकर आता हूं" कहकर मनीष अंदर चला गया । बिना यह सोचे कि नेहा भी अभी आई है वह भी थकी होगी ।
चाय पीकर मनीष वहीं पैर पसार कर टीवी देखने में मगन हो गया और नेहा घर के बाकी काम निपटाने में लग गई।
अगले दिन सुबह- सुबह नेहा की काम वाली वापस आ गई।
अरे !मीना ताई चार दिन से कहां गायब हो ? जानती हो ना मुझे काम पर जाना होता है , और तुम हो बिना बताए कभी भी छुट्टी ले लेती हो !!!
बाई गर्दन झुका कर अंदर आकर अपने काम में लग गई
क्या करती भाभी ! उस दिन मेरा मरद थोड़ा ज्यादा पी कर आया था । बहुत मारा , दो दिन तक तो बिस्तर से उठ भी नहीं पा रही थी
नेहा ने गौर से बाई की तरफ देखा तो उसके शरीर पर हल्के नीले निशान थे
छोड़ क्यों नहीं देती ऐसे मर्द को ?
छोड़ना इतना आसान है भाभी ? और मैं आपकी तरह पढ़ी-लिखी भी नहीं, जो नौकरी करके अपने बच्चों को पाल पोस सकूं , और रहूंगी कहां ? बिना मर्द के इस दुनिया में जीना इतना आसान भी नहीं है
नेहा कुछ सोच कर सिहर गई पर फिर खुद को संयत करते हुए जाने की तैयारी में लग गई
पिछले कुछ दिनों से एक टीवी सीरियल कलाकार मेघना का काउंसलर के पास आना-जाना काफी लगा हुआ था। नेहा और मेघना में घनिष्ठता बढ़ गई । कभी-कभी दोनों के जाने का समय एक सा होता तो मेघना नेहा को अपनी कार से ड्रॉप कर देती।
एक दिन वापसी में नेहा से न रहा गया वो मेघना से पूछ बैठी
मेघना अगर बुरा ना मानो तो एक बात पूछूं ?
बुरा क्यों मानूंगी ?पूछो जो पूछना चाहती हो
आप इतनी मशहूर कलाकार हैं। इतना कमाती है। इतनी छोटी सी उम्र में अपने अच्छी शौहरत हासिल कर ली है । आपके परिवार वालों को तो आप पर नाज़ होगा। फिर आपको किस बात की चिंता है जो आपको काउंसलिंग की जरूरत पड़ने लगी ?
मेघना नेहा की बात सुन गाड़ी से बाहर देखने लगी
कभी-कभी ज्यादा शोहरत भी नुकसानदायक हो जाती है
मेघना के मुंह से अनायास ही निकल गया। फिर खुद को संयत करते हुए नकली मुस्कान के साथ बोली
ज्यादा शौहरत काम के प्रेशर को भी बढ़ा देती है। जिससे न सोने का समय तय होता है न जागने का । और परिवार वालों की उम्मीदें भी दुगनी हो जाती हैं । बस यही वजह होती है स्ट्रेस की
हां , यह सही भी है । जितना नाम, जितनी शौहरत उम्मीदें भी उतनी बढ़ जाती है। फिर संजीदा होते हुए बोली "और वैसे भी हम औरतों से उम्मीदें कुछ ज्यादा ही की जाती है "
नेहा भावनाओं में कह गई व दोनों किसी सोच में डूब गयी
ड्राइवर की आवाज से दोनों का ध्यान भंग हुआ
मैडम हम आ गए
थैंक्स मेघना, फिर मिलते हैं। कहते हुए नेहा उतर गई
मेघना ने भी मुस्कुरा कर उसे विदा किया
नेहा वैसे तो सारा दिन ठीक रहती। परंतु जैसे-जैसे रात होने लगती वह मुरझाने सी लग जाती। खाना खा कर जहां मनीष हॉल में टीवी देखने में मगन था। वही नेहा बालकनी में खड़ी चांद को निहारते हुए कुछ पंक्तियां गुनगुनाने लगी
यह रात आती क्यों है !
संग इतना अंधेरा लाती क्यों है !
गूंजती है कहीं आहें, कहीं सिसकियां
वह इस सन्नाटे को और बढ़ाती क्यों है !!
क्या जरूरत थी सूरज को
समंदर के आगोश में समाने की !!
सितारों को आकाश के आंचल में जगमगाने की !!
यह चांदनी भी लग चांद के गले
इतना मुस्कुराती क्यों है !
यह रात आती क्यों है !
यह रात आती क्यों है !!!
नेहा अपने विचारों में तल्लीन थी इतने में कमरे का दरवाजा बंद होने की आवाज से नेहा का ध्यान भंग हुआ
क्या हुआ ? सोना नहीं है ?यही खड़ी रहोगी?
मनीष के सवालों से सकपका गई नेहा
नहीं बस अंदर ही आ रही थी
चलो जल्दी करो , सुबह जल्दी ऑफिस जाना है
नेहा चुपचाप अंदर आकर बिस्तर पर लेट गई
मनीष का हाथ जैसे ही नेहा के शरीर पर रेंगने लगा नेहा ने मनीष का हाथ पकड़ लिया
आज रहने दो , मन नहीं है
तुम्हारा मन होता कब है ?रोज-रोज के बहाने हैं तुम्हारे
कहकर मनीष झुंझला उठा
पता नहीं कैसी बर्फ की सिल्ली से पाला पड़ा है । अब यह नौटंकी बंद करो
मनीष को अपनी मनमर्जी पूरी करने से नेहा रोक नहीं सकती। शादी के इन दो सालों में इस बात को वो अच्छी तरह से जान चुकी थी । मनीष को मना करने या ज्यादा ना-नुकुर करने पर वह और ज्यादा वहशीपन दिखाता, और हाथ उठाने में भी देर ना करता। मनीष अपना पुरुष दंभ इसी तरीके से संतुष्ट करता । नेहा से कभी कोई गलती हो जाए तो यही सजा, छुट्टी हो तो छुट्टी मनाने का भी यही तरीका। उसकी सोच शायद दोनों टांगों के बीच ही सिमट कर रह गई थी
घर पहुंचकर मेघना अपने कमरे में जाकर निढाल सी लेट गई । शून्य में निहारते हुए कब अंधेरा हो गया उसे पता ही न चला। मोबाइल की घंटी से उसका ध्यान टूटा। स्क्रीन पर राहुल का नाम देखकर उसने फोन उठाया
हेलो मेघना , कहां हो तुम ?
घर पर ही हूं ।आज शूटिंग जल्दी खत्म हो गई थी
तुमने खाना ऑर्डर तो नहीं किया ना ?
अभी नहीं , बताओ क्या ऑर्डर करना है ?
मत करो, मैं लेकर आ रहा हूं
ठीक है । कहकर मेघना ने कॉल डिस्कनेक्ट कर दिया
राहुल और मेघना एक सीरियल की कास्टिंग के दौरान मिले थे। बातों-बातों में दोनों नजदीक आ गए । साथ स्ट्रगलिंग करने लगे। दोनों ने साथ रहने का निर्णय लेकर एक फ्लैट किराए पर ले लिया। मेघना को जल्द ही एक सीरियल में लीड रोल मिल गया। जबकि राहुल अभी तक छोटे-मोटे असाइनमेंट ही कर रहा था। इस वजह से राहुल के अंदर हीन भावना जन्म लेने लगी। जिसे मिटाने के लिए बजाय काम ढूंढने के शराब का सहारा लेना शुरू कर दिया। जिस वजह से आये दिन मेघना और राहुल में झगड़ा और कभी-कभी हाथापाई तक हो जाती
राहुल खाना लेकर आया। मेघना दो प्लेटों में परोस कर ले आई । खाना देते समय
तुम आज फिर पी कर आए हो ?
नहीं स्वीटहार्ट, बस दो पैग लिए हैं । दोस्तों ने जबरदस्ती कि वह भी इसलिए । तुम आओ ना यहां मेरे पास बैठो
राहुल ने मेघना का हाथ पकड़कर पास बिठाना चाहा पर मेघना हाथ छुड़ाकर सामने बैठ गई
क्या बात है ! एक सीरियल क्या मिल गया तुम्हारे तो तेवर ही बदलते जा रहे हैं !!
आज मनु भाई का फोन आया था। तुमने मेरे नाम से उनसे पैसे उधार लिए हैं ? मेघना ने सवालिया नजरों से राहुल को देखा
हां वो मुझे थोड़े पैसों की अचानक जरूरत आ गई थी । कोई बात नहीं तुम तो इतनी बड़ी एक्ट्रेस बन गई हो यह छोटी-मोटी रकम तुम्हारे लिए कोई बड़ी बात नहीं
राहुल बेशर्मी से हंसा
मैं कितना कर्जा चुकाउंगी राहुल ?मेरी कमाई की भी एक लिमिट है। इस फ्लैट का किराया, लाइट बिल, मेंटेनेंस सब मैं भरती हूं। तुम्हारा खर्चा भी मैं उठाती हूं अब क्या तुम्हारी अय्याशियां भी मैं ही पूरी करु ?
राहुल खाने की प्लेट को मेज पर पटकते हुए
रोज-रोज की किटकिट है तुम्हारी। थोड़े पैसे ले लिए तो क्या बुरा किया ? काम मिलने दो सारे पैसे तुम्हारे मुंह पर मारूंगा
काम तो तब मिलेगा ना जब तुम ढूंढोगे ! तुम्हें तो आवारा दोस्तों से ही फुर्सत नहीं
राहुल ने तेजी से उठकर मेघना का मुंह पकड़ लिया
चुप कर ..एक सीरियल क्या मिल गया खुद को बड़ा स्टार समझने लगी है
कहकर राहुल ने मेघना को जोर से तमाचा जड़ दिया । मेघना ने धक्का देकर राहुल को खुद से दूर किया
बस ! हाथ मत उठाना वरना ...
वरना...वरना क्या करेगी ? कहते हुए राहुल ने मेघना की गर्दन पकड़ ली
जिस चेहरे पर इतना घमंड है ना तुझे ..बिगाड़ कर रख दूंगा उसी चेहरे को
बिगाड़ दो... वैसे भी तंग आ गई हूं अब रोज-रोज की तुम्हारी हरकतों से । बंद कर दूंगी कल से काम करना
और राहुल को धक्का देकर मेघना ने अपने रूम में जाकर दरवाजा अंदर से बंद कर दिया
सुबह जैसे ही नेहा ने दरवाजा खोला काम वाली बाई सामने थी। उसकी आंख नीली व शरीर पर मार के निशान थे
अरे मीना ताई ! आज तो रविवार है ना ! तुम इतनी जल्दी कैसे आ गई ? यह क्या हुआ ? रात को फिर मारा है तुम्हारे पति ने?
अंदर आते ही मीना ताई रोने लगी
भाभी आज आपकी मदद की जरूरत है । मना मत करना, आपका ही सहारा है । कहते हुए नेहा के सामने हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाने लगी
अरे ! ऐसा क्यों कहती हो ? हुआ क्या बताओ तो
भाभी रात को मेरा मरद बहुत दारु पी कर आया था। बच्चों के सामने मुझसे जबरदस्ती करने लगा। मैंने धक्का देकर दूर कर दिया । उसने गालियां देकर मुझे बहुत मारा फिर जाकर सो गया। थोड़ी देर में मैं और बच्चे भी सो गए। पर साला हरामी , आधी रात को जाग गया और उसने ...उसने.. कहते हुए रोने लगी
क्या किया उसने? रोना बंद करो बताओ क्या हुआ ?
उसने बेटी पर हाथ डालने की कोशिश की ...
कहते हुए मीना ताई पल्लू से मुंह छुपा रोने लगी
मैं बेटी की चीख सुनकर जाग गई। अब तक मुझ पर जुल्म करता रहा , मैं सहती रही पर अपनी बच्ची पर जुल्म कैसे सहती !!
पर ताई ..यह भी तो हो सकता है उसने नशे में ऐसा किया हो। उसने समझा हो तुम सो रही हो वहां । वरना कौन सा बाप अपनी बेटी की इज्जत पर हाथ डालेगा ?
नहीं भाभी ऐसा उसने दूसरी बार किया है। पहले भी कमीना एक बार ऐसा कर चुका है। तब मुझे भी यही लगा था इसलिए उस दिन के बाद बेटी को दूर सुलाने लगी । पर कल रात को उठकर उसके पास गया। जब मैंने उसे बेटी से दूर किया तो कहने लगा "मेरी बेटी है, मेरी मर्जी इसके साथ कुछ भी करूं "
नेहा उसकी बातें सुनकर आवाक रह गई
इसलिए मैंने रात को ही वो घर छोड़ दिया। तब तो मैं देवर के घर आ गई पर अब सोचा है अलग खोली लेकर अपनी बच्चियों के साथ रहूंगी। कम से कम मेरी बेटियां तो उस जानवर से सुरक्षित रहेगी। अब मुझ में और अत्याचार सहने की ताकत नहीं रही। पानी के साथ रोटी खा लूंगी पर अब और जुल्म नहीं सह सकूंगी। आप मुझे सिर्फ पांच हजार उधार दे दो। मुझे झोपड़ी की पगड़ी देनी है। मैं आपका एक भी पैसा नहीं खाऊंगी। सारा पैसा चुका दूंगी
हाथ जोड़ते हुए मीना ताई गिड़गिड़ाने लगी
नेहा सोचने लगी कहीं मनीष गुस्सा हो गए तो ? पर यह बेचारी भी हमसे नहीं लेगी तो किस से लेगी ! इसकी भी मजबूरी है। एक काम करती हूं, अभी इसे दे देती हूं। बाद में मनीष से कहूंगी वह भी समझ जाएंगे। आखिर किसी की बच्ची का सवाल है और मनीष इतनी संगदिल तो नहीं हो सकते
अच्छा ताई तुम रुको मैं पैसे लेकर आती हूं । पर देखो , हर महीने तुम्हारी पगार से काटूंगी
हां भाभी मैं आपकी पाई-पाई चुका दूंगी
नेहा ने जैसे ही मनीष को मीना ताई की बात बताई मनीष का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया
तुम्हारी इतनी हिम्मत ! बिना मुझसे पूछे तुमने उस काम वाली को इतने रुपए दे दिए ?
पर मनीष हम उसकी मदद नहीं करेंगे तो कौन करेगा ? उसने कहा है , वह सारे पैसे धीरे-धीरे चुका देगी
पर मुझसे बिना पूछे तुम्हारी इतनी हिम्मत हुई कैसे ? तुम्हारा बाप देकर गया था वह पैसे ?
मनीष मैंने उसे अपनी तनख्वाह में से पैसे दिए हैं। तुम्हारी जेब से नहीं निकाले । बाप का नाम सुनना नेहा को अच्छा न लगा
एक तो गलती करती है ऊपर से मुझसे ही जबान लड़ाती है साली ! कहकर मनीष ने जोरदार चांटा नेहा के गाल पर जड़ दिया जिससे नेहा सोफा पर गिर गई
बहुत दिन हो गए ठीक नहीं किया तुझे , आज ठीक करता हूं। सारा तेरा-मेरा निकालता हूं । कहकर मनीष नेहा को बालों से पकड़कर रूम में ले जाने लगा
नेहा ने खुद को छुड़ाने की कोशिश की पर मनीष की मजबूत पकड़ से खुद को छुड़ा नहीं पाई । मनीष ने उसे पलंग पर पटककर अपनी टी-शर्ट उतारी, और नेहा पर टूट पड़ा। नेहा रोते हुए मनीष की ज्यादती बर्दाश्त करती रही। जब मनीष अपनी मर्जी पूरी कर चुका तो वह बाहर चला गया। नेहा खुद को संयत करते हुए सोचने लगी
मुझ से अच्छी तो यह काम वाली मीना ताई है । कम से कम इसने अत्याचार के खिलाफ आवाज तो उठाई । पर मैं क्या हूं ? पढ़ी-लिखी गंवार !! अगर मां से कहूंगी तो वह फिर से समझा-बुझाकर , समाज की दुहाई देकर एक दिन सब ठीक हो जाने की बात कहेंगी । पर जब वो बाई होकर मेहनत मजदूरी करके अपना पेट भर सकती है तो क्या मैं अपना पेट खुद नहीं भर सकती !! क्यों हम औरतें अपने पैरों पर खड़े होने के बावजूद भी पति , बाप या भाईयों पर आश्रित रहती है ? क्यो हम अपना आशियाँ खुद नही बना सकती । नहीं ..अब और नहीं ...एक मजबूत निर्णय लेते हुए नेहा अपना सामान पैक कर के बाहर आई
कहां जा रही हो ? अपने बाप के घर ? मनीष ने मजाक उड़ाने वाले लहजे में कहा
देखता हूं कितने दिन रखता है तुम्हारा बाप तुम्हें ?
नहीं ...अब ना तुम, ना बाप, ना भाई ..किसी का आश्रय नहीं चाहिए मुझे । अब अपनी जिंदगी मैं अपने हिसाब से जिऊंगी
तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है ! लगता है फिर से ठीक करना पड़ेगा
कहकर जैसे ही मनीष ने फिर हाथ उठाया , नेहा ने उसका हाथ हवा में ही रोक लिया और नीचे झटकते हुए एक ज़ोरदार चांटा मनीष के गाल पर जड़ दिया
बस !! अब और नहीं ....कहकर बैग लेकर बिना मुड़े नेहा घर से बाहर निकल गई
मेघना घर पहुंची तो देखा राहुल पहले से वहां शराब पी रहा था । दोपहर को मनु भाई ने फिर पैसे लेने की बात बताई थी। जिस वजह से मेघना पहले ही गुस्से में थी
अब शाम से ही पीना शुरू कर दिया तुमने ?
अरे यार ! अब आने से शुरू मत हो जाओ। नशे में धुत राहुल बोला
तुम कब सुधरोगे राहुल ? तुमने फिर मनु भाई से पैसे लिए हैं ? मैं आखिर कब तक तुम्हारा बोझ उठाती रहूंगी ?
शट अप ...जस्ट शट अप ..कहते हुए राहुल ने मेघना का गला पकड़ लिया
जब देखो पैसा-पैसा करती हो
कमाओ तो जानो, पैसा कमाना कितना मुश्किल है राहुल
एक सीरियल मिलने पर इतनी अकड़ ! आज सारी अकड़ निकलता हूं तुम्हारी
कहकर राहुल ने मेघना को सोफे पर धक्का दिया और वहीं से कांच का फूलदान मेघना को मारने के लिए उठाया। मेघना ने झट से उठकर उसका हाथ पकड़ लिया, और उसके हाथ से फूलदान लेकर जमीन पर फेककर राहुल को धक्का दे अंदर कमरे में चली गई । कुछ देर बाद रूम से बैग लेकर निकली
कहां जाओगी ? जाओ निकल जाओ !! तुम क्या सोचती हो तुम नहीं रहोगी तो क्या मैं जी नहीं पाऊंगा ? जाओ ...चली जाओ
मेघना ने बैग दरवाजे के बाहर रखा और अंदर आकर राहुल को बाजू से पकड़ कर उठाया
बस दो मिनट में ही अकल ठिकाने आ गयी!! समझ गई कहां जाओगी । राहुल नशे में धुत बड़बड़ाता जा रहा था। मेघना राहुल को पकड़कर दरवाजे तक ले आई । घर से बाहर धक्का देकर कहा
यह मेरा नहीं, तुम्हारा सामान है । इस घर का किराया मैं देती हूं । इसलिए मैं नहीं, जाओगे तुम यहां से , और दोबारा वापस आने की कोशिश भी मत करना ...वरना पुलिस के हवाले कर दूंगी।
कहकर मेघना ने घर का दरवाजा बंद कर दिया। बंद दरवाजे से पीठ टिकाकर मेघना सोचने लगी
किसी ने सही कहा है, किनारे पर खड़े रहकर पानी को घूरने से समुंदर पार नहीं होता। पार करने के लिए समंदर में उतरना पड़ता है।
प्रिया वच्छानी
बुधवार, 17 अप्रैल 2019
पापा की बेटी
"Pls भाई साहब मुझे सिर्फ़ दो मिनट के लिए अंदर जाने दे "
"नहीं मैडम , आप समझिये हम आपरेशन थियेटर में ऐसे किसी को जाने नहीं दे सकते "
"आप समझने की कोशिश करीये ,मेरे पापा को अभी अंदर ले कर गये हैं , अभी वो बेहोश नहीं हुए होंगे मैं बस दो मिनट उन्हें देख आऊं "
"नहीं मैडम आप नहीं जा सकती अंदर "
इतने में आवाजें सुनकर डाक्टर आये " क्या बात है ? क्या शोर है ये ? "
"डाक्टर साहब आज मेरे पापा की सर्जरी है , आपने सुबह नौ बजे का समय दिया था आपरेशन का मगर अभी साढे आठ ही बजे हैं "
"हां तो ?" डाक्टर हैरानी से बोला
डाक्टर साहब मैं यहां से दूर रहती हूं , सुबह पांच बजे से घर से निकली हूं ताकि आठ बजे तक पहुंच जाऊँ और पापा के साथ कुछ वक्त बिताने का मौका मिलेगा ,मगर जैसे ही मैं आयी तो पता चला आप लोग मेरे पापा को अभी अंदर ले गये हैं "
"आप चाहती क्या हैं ?"
"मैं सिर्फ़ अपने पापा से दो मिनट मिलना चाहती हूं , दिखाना चाहती हूं कि मैं पहुंच गयी हूं ताकि उनको भी संबल मिले कि उनकी बेटी बाहर उनका इंतजार कर रही है ...pls डाक्टर साहब pls " आँखों में पानी लिए हुए लगभग गिडगिडाने के अंदाज में कहा
" मगर आप ऐसे अंदर नहीं जा सकती "
"pls डा. साहब pls बस एक मिनट के लिए "
फिर कुछ सोचते हुए डाक्टर अपना हरा कोट , हरी टोपी और चप्पल उतारकर
" यह पहन लो और जाओ बाये हाथ की तरफ दूसरे नं के बेड पर हैं आप के पापा , लेकिन सिर्फ़ दो मिनट "
"thank u , thank u soo much डा. साहब " और जल्दी वह कोट पहन कर मैं पहुंच गयी आपरेशन थियेटर में
"अरे ! तुम अंदर कैसे आ गयी ?" पापा ने हैरानी से पूछा
"आखिर आपकी बेटी हूं पापा कौन रोक सकता है मुझे आपसे मिलने से " style मारते हुए कहा मैंने
फिर न पापा ने कुछ कहा न ही मैंने बस दोनों मुस्कराये , उस समय पापा की आँखों में एक सुकून सा नज़र आया , और पापा की सर्जरी कामयाब भी हुई ,
आज शुक्रीया कहना चाहती हूं उस डाक्टर को जिसने एक बेटी और बाप की भावनाओं को समझा । Thankx
शुक्रवार, 5 अप्रैल 2019
नवजात बच्ची की व्यथा
मुझे अपने गले से लगा लो न माँ
डर लगता है इस जालिम दुनिया से
मुझे अपने आँचल में छुपा लो न माँ
न जाने क्यू लोग बेटियो को
कोख में ही मार देते है
बेटा पाने की चाह में
बेटियो की जान वार देते है
तुम मेरे साथ ऐसा न होने दोगी न माँ
डर लगता है इस जालिम दुनिया से
मुझे अपने आँचल में छुपा लो न माँ
इक बार जन्म लेने की कोशिश की थी मैंने
अभी बस माँ की कोख ही देखी थी मैंने
फिर इक दिन न जाने कैसी हलचल हुई
देख अपने आस-पास हथियारों को
मेरे दिल में कंपन हुई
चुभा था मुझे जब वो हथियार
जोर से की थी मैंने चीख पुकार
माँ बचा लो मुझे कहते हुए
मैं बहुत चिल्लायी थी
पर शायद मेरी चीख माँ
के कानो तक पहुँच न पाई थी
दर्द अपनी हद से पार हुआ था तब
अस्पताल के पीछे
कुत्तो और चील कौवों ने
मेरी बोटी बोटी को नोचा था जब
अब फिर यह अत्याचार
मुझ पर न होने दोगी न माँ
डर लगता है इस जालिम दुनिया से
मुझे अपने आँचल में छुपा लो न माँ
फिर एक बार मैं इस दुनिया में आई थी
अभी आँख मेरी खुलने भी न पाई थी
बाऊजी ने दूध के बर्तन में
मेरे होठो को सिया था
बड़ी घुटन हुई थी मुझे तब
जब कानो और नाक से
मैंने वो दूध पिया था
जिस दूध को पी मैं बड़ी होती तब
उसी दूध से मेरी मौत हुई थी जब्त
तुम तो अब मेरे साथ फिर ऐसा
न होने दोगी न माँ
डर लगता है इस जालिम दुनिया से
मुझे अपने आँचल में छुपा लो न माँ।
प्रिया वच्छानी
गुनहगार कौन
सुनीता स्तब्ध रह गई फोन पर यह सुनते ही कि उसके भाई का एक्सीडेंट हो गया। सहमी हुई तुंरत अस्पताल पहुँची। भाई को ऑपरेशन थिएटर में ले जाया गया था। सब बाहर बैठे इंतज़ार कर रहे थे। उनके पास एक बुढ़िया भी बैठी हुई थी। पहले तो किसी का ध्यान नहीं था उसपर किन्तु जब उसकी हलके से चिल्लाने की आवाज़ आई तब उस तरफ ध्यान गया।
उसका पति जो की वहीँ अस्पताल में भर्ती था। जो चाय उन्हें दी गयी थी वह उसमें से आधा कप चाय अम्मां के लिए बचाकर लाये थे। और उन्हें चाय पीने के लिए आग्रह करने लगे। किन्तु वह जितना प्यार से कहते अम्मां उतनी ही निष्ठुरता से मना कर देती। यह तमाशा वहां बैठे लगभग सारे लोग देख रहे थे। कोई उस बाबा को ठरकी कहता। तो कोई उस औरत को निर्दयी। कोई कहता कितना प्यार करता है इस उम्र में भी अपनी पत्नी से किन्तु वह कितनी बुरी है जो ऐसे मना कर रही है। सहसा सुनीता के कानों में कुछ ऐसे शब्द पड़े जिससे वह स्तब्ध हो गयी? वह बाबा कह रहा था पता नहीं क्यों भगवान मेरी परीक्षा ले रहा है ! क्यों उसने मुझे बचा लिया। इससे अच्छा होता मैं मर जाता। अब तो अंत भी निकट है अब तो मुझे माफ़ कर दो
तब अम्मा ने कहा भगवान तुम्हारी नहीं मेरी परीक्षा ले रहा है। सिर्फ आज नहीं बल्कि शुरू से ले कर अब तक। इतना कहकर उन्होंने आँखे बंद करके दीवार से सर टिका लिया।
बाकी सभी ने तो अपने-अपने आकलन लगा लिए किन्तु सुनीता को वो सत्य नहीं लगा जो दिख रहा था। खैर उस दिन तो वह अपनी ही उलझनों में थी। इसलिए अपना ध्यान हटा लिया वहां से। भाई को अस्पताल में कुछ दिन रखा गया।और उसका वहां आना-जाना लगा रहता।
एक दिन वही अम्मां बाहर बेंच पर बैठी दिख गयी। सुनीता के मन में उत्सुकता हुई और चाय लेकर उस अम्मां के पास बैठ गयी। बड़े प्रेम से उसे चाय पीने का आग्रह किया। अम्मां सुनीता की बात नहीं टाली और चाय ले ली। फिर बात को आगे बढ़ाते हुए उनसे पूछ बैठी। आप उस दिन बाबा से ऐसा व्यवहार क्यों कर रही थी? अम्मां ने उसकी और गौर से देखा और कहा तुम यह सब क्यों जानना चाहती हो?
सुनीता ने सहजता से कहा ,आप नहीं बताना चाहती तो मत बताइये, किन्तु मुझे लग रहा है बात सिर्फ उतनी नहीं जितनी नजर आ रही है।
कोई और बात नहीं बस मैं शुरू से ऐसी ही हूँ रूखे स्वभाव की। अम्मां ने रुखा सा जवाब दिया
मैं आपसे बहुत छोटी हूँ अम्मां जी और आपसे कम अनुभव है मुझे जिंदगी का किन्तु इतना तो मैं भी जानती हूँ कोई भी इंसान बिना वजह अपने जीवन साथ के साथ ऐसे बात नहीं करता। कम अनुभव में भी इतना तो जान गयी हूँ मैं की सच सिर्फ उतना नहीं होता जितना सामने दिखता है। सुनिता ने अम्मां की आँखों में देखते हुए कहा
आज अम्मा का मन भी भर आया था। उसे सुनिता में कोई अपना सा लगने वाला मिला, जिसने औरों की तरह सिर्फ उसे गलत नहीं समझा,जो शायद आज उसे सुनना चाह रहा था। वर्षों से दबा दर्द आखिर जुबां पर आ ही गया और ठंडी सांस भरते हुए अम्मा बोली, सब मुझे गलत समझते हैं। और यही सवाल करते हैं। पर मैं किसी की बात का जवाब नहीं देती। किन्तु तुम्हारी बातों ने न जाने मुझे कैसा सुकून दिया है। इसलिए आज तुम्हें बताती हूँ। अम्मा ने कहना शुरू किया।
पति-पत्नी का रिश्ता सबसे मजबूत रिश्ता होता है। जितना मजबूत यह रिश्ता होता है न उतनी ही नाजुक इसे जोड़ने वाली डोर होती है। कुछ पति-पत्नी यह रिश्ता जीते हैं। कुछ सामंजस्य न बैठ पाने के कारण अपनी राहें अलग बना लेते हैं। और कुछ महज समाज के लिए इस रिश्ते को उम्र भर बस ढोते हैं। मैं ऐसे लोगों में से हूँ जो इस रिश्ते को ढो रही हूँ। शून्य में ताकते हुए उन्होंने कहना जारी रखा
हमारी शादी आज से करीब अड़तीस साल पहले हुई थी। सारे भाइयों में मेरे पति ही अच्छा कमाते । इसलिए उनकी माँ उन्हें प्यार भी ज्यादा करती किन्तु वो न जाने क्यों मुझे एक आँख भी पसंद न करती। उन्हें यह डर था कहीं मैं घर से अलग न हो जाऊं। कहीं मैं उनके बेटे को उनसे अलग न कर दूँ। वैसे तो घर में किसी बात की कमी न थी। कमी थी तो बस प्यार की।
वह मुझे प्यार करते किन्तु अपनी जरुरत पड़ने पर। मेरे पास भी आते किन्तु बस चंद मिनटों के लिए। उसके बाद मैं क्या सोचती हूँ, क्या करती हूँ उन्हें उस बात से कोई मतलब न था। उन्हें या तो अपना परिवार या फिर अपनी शराब की बोतल दिखती। उनकी माँ जो कहती वह सब सच मान लेते मेरी बात सुनने के लिए मुझे समझने के लिए उनके पास वक्त ही न था। कई बार अपनी माँ के कहने पर बिना मेरी एक भी सुने मुझे बुरी तरह से मारते। कई दिनों तक मुझे खाना भी न दिया जाता। किन्तु मेरे पति ने कभी ये पूछने की जरूरत भी नहीं समझी के मैंने खाना खाया के नहीं। जब बीमार पड़ती तो लगता शायद अब मेरी थोड़ी कदर करेंगे, देखभाल करेंगे। किन्तु मेरे बीमार पड़ते ही यह लोग मुझे मेरे मायके छोड़ आते व् मुझसे ऐसे रिश्ता काट लेते जैसे मैं इनकी जिंदगी में हूँ ही नहीं। ठीक होने पर माँ-बाबा वापस छोड़ जाते। वह भी क्या करते दुनियां वालों को जवाब जो देना पड़ता है के ब्याही बेटी क्यों इतने दिन से यहाँ है। कहते हुए अम्मां की आँखों से दो बूंदे टपक पड़ी।
सुनीता उनके हाथ पर हाथ रख उन्हें बंधाने की कोशिश करने लगी। उन्होंने कहना जारी किया।
कई साल तक मैंने अपने रिश्ते को बचाने की उसे नया जीवन देने की कोशिश की किन्तु हर बार मेरी कोशिश नाकाम हो जाती। इस बीच हमारा एक बेटा भी हुआ। तब भी लगा के शायद अब सब संभल जाएगा। किन्तु तब भी इन्हें सिर्फ अपने बेटे से मतलब रहा मुझसे नहीं। प्रसव के छठवे दिन ही फिर से अपनी माँ के कहने पर मुझे न सिर्फ मारा पीटा गया बल्कि दो दिन भूखे भी रखा। अब तो यह नियम बन गया था।
इस तरह मार और भूख सहते हुए आखिर मैंने इसे ही मेरा नसीब मान लिया और सबसे मोह हटा लिया। बस एक मशीन की तरह जीवन जीने लगी। अपने काम में मगन रहती। किसी से कोई उम्मीद नहीं, और इस रिश्ते को जीती नहीं बस दुनिया के दिखावे के लिए ढोती।
किन्तु कल तो बाबा को देखा हमने वो आपको चाय पीने के लिए कितनी मिन्नतें कर रहे थे। पर आपने ही रुखा सा जवाब दिया। सुनिता अपने सवालों पर काबू न रख सकी और पूछ बैठी।
हां कल तो वो मिन्नतें कर रहे थे और कल ही क्यों वो पिछले पांच सालों से रोज़ ऐसे ही मनाने की कोशिश करते हैं। मेरी सास के मरने के बाद उन्हें इस बात का अहसास हुआ है के मैं भी कोई मशीन नहीं एक जीती जागती इंसान हूँ। पर अफ़सोस मेरे अंदर की सारी भावनाये अब मर चुकी हैं। अब कौन जाने कितना जीयूँगी। पूरी ज़िन्दगी ख़त्म होने के बाद अब अंत में आकर यह मुझसे माफ़ी मांग रहे हैं। कि मैं उन्हें माफ़ कर दूँ ताकि वो चैन से मर पाये। किन्तु मैंने जो अपने जीवन के इतने साल तकलीफें सही वो? जानती हो ! ये शायद मर्द ज़ात के स्वभाव में शामिल है कि वो दुनियां की सारी औरतों की कद्र करता है सिवाय अपनी पत्नी के, शाादी के बाद औरतें अपना सबकुछ पति पर वार देती हैं और बदले में चाहती है उससे प्यार, वक़्त और कदर मगर अफसोस उसे उपेक्षा के अलावा कुुुछ नहीं मिलता। जब बुुढ़ापा दस्तक देने लगता है तब पति को पत्नी की याद आती है मगर तब तक पत्नी की सारी इच्छाऐं अपेक्षाऐं मर जाती हैं
उनकी आँखों से अश्रु अविरल बहते जा रहे थे। नहीं मैं कभी उनको माफ़ नहीं कर पाऊँगी। इतना कहकर वो उठकर चली गयी
सुनीता वहीँ बैठे सोचने लगी क्या गलती सिर्फ उस बाबा की है? क्या इसमें उनकी माँ भी उतनी जिम्मेदार नहीं हैं जिन्होंने अपनी खुदगर्ज़ी के चलते अपनी बहू की ही नहीं बल्कि अपने बेटे की भी ज़िन्दगी तबाह कर दी और उन्हें कभी एक न होने दिया ?
प्रिया वच्छानी