शुक्रवार, 5 अप्रैल 2019

गुनहगार कौन

सुनीता स्तब्ध रह गई फोन पर यह सुनते ही कि उसके  भाई का एक्सीडेंट हो गया। सहमी हुई तुंरत अस्पताल पहुँची। भाई को ऑपरेशन थिएटर में ले जाया गया था। सब बाहर बैठे इंतज़ार कर रहे थे। उनके पास एक बुढ़िया भी बैठी हुई थी। पहले तो किसी का ध्यान नहीं था उसपर किन्तु जब उसकी हलके से चिल्लाने की आवाज़ आई तब उस तरफ ध्यान गया। 
उसका पति जो की वहीँ अस्पताल में भर्ती था। जो चाय उन्हें दी गयी थी वह उसमें से आधा कप चाय अम्मां के लिए बचाकर लाये थे। और उन्हें चाय पीने के लिए आग्रह करने लगे। किन्तु वह जितना प्यार से कहते अम्मां उतनी ही निष्ठुरता से मना कर देती। यह तमाशा वहां बैठे लगभग सारे लोग देख रहे थे। कोई उस बाबा को ठरकी कहता। तो कोई उस औरत को निर्दयी। कोई कहता कितना प्यार करता है इस उम्र में भी अपनी पत्नी से किन्तु वह कितनी बुरी है जो ऐसे मना कर रही है। सहसा सुनीता के कानों में कुछ ऐसे शब्द पड़े जिससे वह स्तब्ध हो गयी? वह बाबा कह रहा था पता नहीं क्यों भगवान मेरी परीक्षा ले रहा है ! क्यों उसने मुझे बचा लिया। इससे अच्छा होता मैं मर जाता। अब तो अंत भी निकट है अब तो मुझे माफ़ कर दो

तब अम्मा ने कहा भगवान तुम्हारी नहीं मेरी परीक्षा ले रहा है। सिर्फ आज नहीं बल्कि शुरू से ले कर अब तक। इतना कहकर उन्होंने आँखे बंद करके दीवार से सर टिका लिया। 

बाकी सभी ने तो अपने-अपने आकलन लगा लिए किन्तु सुनीता को वो सत्य नहीं लगा जो दिख रहा था। खैर उस दिन तो वह अपनी ही उलझनों में थी। इसलिए अपना ध्यान हटा लिया वहां से। भाई को अस्पताल में कुछ दिन रखा गया।और उसका वहां आना-जाना लगा रहता। 
एक दिन वही अम्मां बाहर बेंच पर बैठी दिख गयी। सुनीता के मन में उत्सुकता हुई और चाय लेकर उस अम्मां के पास बैठ गयी। बड़े प्रेम से उसे चाय पीने का आग्रह किया। अम्मां सुनीता की बात नहीं टाली और चाय ले ली। फिर बात को आगे बढ़ाते हुए उनसे पूछ बैठी। आप उस दिन बाबा से ऐसा व्यवहार क्यों कर रही थी? अम्मां ने उसकी और गौर से देखा और कहा तुम यह सब क्यों जानना चाहती हो? 
सुनीता ने सहजता से कहा ,आप नहीं बताना चाहती तो मत बताइये, किन्तु मुझे लग रहा है बात सिर्फ उतनी नहीं जितनी नजर आ रही है। 
कोई और बात नहीं बस मैं शुरू से ऐसी ही हूँ रूखे स्वभाव की। अम्मां ने रुखा सा जवाब दिया 
मैं आपसे बहुत छोटी हूँ अम्मां जी और आपसे कम अनुभव है मुझे जिंदगी का किन्तु इतना तो मैं भी जानती हूँ कोई भी इंसान बिना वजह अपने जीवन साथ के साथ ऐसे बात नहीं करता। कम अनुभव में भी इतना तो जान गयी हूँ मैं की सच सिर्फ उतना नहीं होता जितना सामने दिखता है। सुनिता ने अम्मां की आँखों में देखते हुए कहा  
आज अम्मा का मन भी भर आया था। उसे सुनिता में कोई अपना सा लगने वाला मिला,  जिसने औरों की तरह सिर्फ उसे गलत नहीं समझा,जो शायद आज उसे सुनना चाह रहा था। वर्षों से दबा दर्द आखिर जुबां पर आ ही गया और ठंडी सांस भरते हुए अम्मा बोली, सब मुझे गलत समझते हैं। और यही सवाल करते हैं। पर मैं किसी की बात का जवाब नहीं देती। किन्तु तुम्हारी बातों ने न जाने मुझे कैसा सुकून दिया है। इसलिए आज तुम्हें बताती हूँ। अम्मा ने कहना शुरू किया। 

पति-पत्नी का रिश्ता सबसे मजबूत रिश्ता होता है। जितना मजबूत यह रिश्ता होता है न उतनी ही नाजुक इसे जोड़ने वाली डोर होती है। कुछ पति-पत्नी यह रिश्ता जीते हैं। कुछ सामंजस्य न बैठ पाने के कारण अपनी राहें अलग बना लेते हैं। और कुछ महज समाज के लिए इस रिश्ते को उम्र भर बस ढोते हैं। मैं ऐसे लोगों में से हूँ जो इस रिश्ते को ढो रही हूँ। शून्य में ताकते हुए उन्होंने कहना जारी रखा

हमारी शादी आज से करीब अड़तीस साल पहले हुई थी। सारे भाइयों में मेरे पति ही अच्छा कमाते । इसलिए उनकी माँ उन्हें प्यार भी ज्यादा करती किन्तु वो न जाने क्यों मुझे एक आँख भी पसंद न करती। उन्हें यह डर था कहीं मैं घर से अलग न हो जाऊं। कहीं मैं उनके बेटे को उनसे अलग न कर दूँ। वैसे तो घर में किसी बात की कमी न थी। कमी थी तो बस प्यार की। 

वह मुझे प्यार करते किन्तु अपनी जरुरत पड़ने पर। मेरे पास भी आते किन्तु बस चंद मिनटों के लिए। उसके बाद मैं क्या सोचती हूँ, क्या करती हूँ उन्हें उस बात से कोई मतलब न था। उन्हें या तो अपना परिवार या फिर अपनी शराब की बोतल दिखती। उनकी माँ जो कहती वह सब सच मान लेते मेरी बात सुनने के लिए मुझे समझने के लिए उनके पास वक्त ही न था। कई बार अपनी माँ के कहने पर बिना मेरी एक भी सुने मुझे बुरी तरह से मारते। कई दिनों तक मुझे खाना भी न दिया जाता। किन्तु मेरे पति ने कभी ये पूछने की जरूरत भी नहीं समझी के मैंने खाना खाया के नहीं। जब बीमार पड़ती तो लगता शायद अब मेरी थोड़ी कदर करेंगे, देखभाल करेंगे। किन्तु मेरे बीमार पड़ते ही यह लोग मुझे मेरे मायके छोड़ आते व् मुझसे ऐसे रिश्ता काट लेते जैसे मैं इनकी जिंदगी में हूँ ही नहीं। ठीक होने पर माँ-बाबा वापस छोड़ जाते। वह भी क्या करते दुनियां वालों को जवाब जो देना पड़ता है के ब्याही बेटी क्यों इतने दिन से यहाँ है। कहते हुए अम्मां की आँखों से दो बूंदे टपक पड़ी। 

सुनीता उनके हाथ पर हाथ रख उन्हें बंधाने की कोशिश करने लगी। उन्होंने कहना जारी किया। 

कई साल तक मैंने अपने रिश्ते को बचाने की उसे नया जीवन देने की कोशिश की किन्तु हर बार मेरी कोशिश नाकाम हो जाती। इस बीच हमारा एक बेटा भी हुआ। तब भी लगा के शायद अब सब संभल जाएगा। किन्तु तब भी इन्हें सिर्फ अपने बेटे से मतलब रहा मुझसे नहीं। प्रसव के छठवे दिन ही फिर से अपनी माँ के कहने पर मुझे न सिर्फ मारा पीटा गया बल्कि दो दिन भूखे भी रखा। अब तो यह नियम बन गया था।

इस तरह मार और भूख सहते हुए आखिर मैंने इसे ही मेरा नसीब मान लिया और सबसे मोह हटा लिया। बस एक मशीन की तरह जीवन जीने लगी। अपने काम में मगन रहती। किसी से कोई उम्मीद नहीं, और इस रिश्ते को जीती नहीं बस दुनिया के दिखावे के लिए ढोती। 
किन्तु कल तो बाबा को देखा हमने वो आपको चाय पीने के लिए कितनी मिन्नतें कर रहे थे। पर आपने ही रुखा सा जवाब दिया। सुनिता अपने सवालों पर काबू न रख सकी और पूछ बैठी।
हां कल तो वो मिन्नतें कर रहे थे और कल ही क्यों वो पिछले पांच सालों से रोज़ ऐसे ही मनाने की कोशिश करते हैं। मेरी सास के मरने के बाद उन्हें इस बात का अहसास हुआ है के मैं भी कोई मशीन नहीं एक जीती जागती इंसान हूँ। पर अफ़सोस मेरे अंदर की सारी भावनाये अब मर चुकी हैं। अब कौन जाने कितना जीयूँगी। पूरी ज़िन्दगी ख़त्म होने के बाद अब अंत में आकर यह मुझसे माफ़ी मांग रहे हैं। कि मैं उन्हें माफ़ कर दूँ ताकि वो चैन से मर पाये। किन्तु मैंने जो अपने जीवन के इतने साल तकलीफें सही वो? जानती हो ! ये शायद मर्द ज़ात के स्वभाव में शामिल है कि वो दुनियां की सारी औरतों की कद्र करता है सिवाय अपनी पत्नी के, शाादी के बाद औरतें अपना सबकुछ पति पर वार देती हैं और बदले में चाहती है उससे प्यार, वक़्त और कदर मगर अफसोस उसे उपेक्षा के अलावा कुुुछ नहीं मिलता। जब बुुढ़ापा दस्तक देने लगता है तब पति को पत्नी की याद आती है मगर तब तक पत्नी की सारी इच्छाऐं अपेक्षाऐं मर जाती हैं 

उनकी आँखों से अश्रु अविरल बहते जा रहे थे। नहीं मैं कभी उनको माफ़ नहीं कर पाऊँगी। इतना कहकर वो उठकर चली गयी 

सुनीता वहीँ बैठे सोचने लगी क्या गलती सिर्फ उस बाबा की है? क्या इसमें उनकी माँ भी उतनी जिम्मेदार नहीं हैं जिन्होंने अपनी खुदगर्ज़ी के चलते अपनी बहू की ही नहीं बल्कि अपने बेटे की भी ज़िन्दगी तबाह कर दी और उन्हें कभी एक न होने दिया ?
प्रिया वच्छानी

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