मानव अधिकार की धज्जियों को उड़ते देखा
हमने पल-पल यहाँ बच्चीयों को मरते देखा
थी जिनकी उम्र अभी गुड्डे-गुड़ियों संग खेलने की
उन्ही बच्चीयों के पेट में पाप को पलते देखा
मासूम बच्चीयां पैदा करती अनचाही संतान को
बच्ची हो कोख में तो विवाहिता का गर्भ गिरते देखा
ये कैसी लचर क़ानून वयवस्था है इस देश की
बलात्कारियों को खुले आम विचरण करते देखा
नहीं रही महफूज़ बेटियां अब अपने घरो में भी
बाप के हाथों भी बेटी की अस्मत को लुटते देखा
कभी मारी जाती कोख में, कभी पैदा कर फेकी जाती
दहेज़ के लोभियों के हाथों तिल-तिल कर जलते देखा
मानवता हो रही है शर्मसार हर रोज आज यहां
हवस के अंधे इंसानो को दानवों का रूप धरते देखा।
प्रिया
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें