शुक्रवार, 25 दिसंबर 2015

अधूरा प्यार

पीहू ने तैयार हो कर शौफर को गाडी निकालने के लिये आवाज़ लगायी। और महरी से कहा "सीमा अगर साहब आ जाये तो कहना मैं सुषमा से मिलने गयी हूं ।" 
पीहू अच्छी तरह जानती थी कि जब उसका मन उदास होता तो सुषमा के अलावा कोई और न था जिससे वो अपने मन की बात बता सकती। इसलिए वह सीधे सुषमा से मिलने गई । 
दोनो बाहर गार्डन में बैठी चाय पी रही थी। सुषमा ने पीहू की उदासी को भापते हुए कहा "क्या बात है ? आज इतनी बुझी-बुझी सी क्यूं हो?" 
"कुछ ख़ास नही,बस तुमसे मिलने का मन किया तो चली आई " 
"तुम अच्छी तरह से जानती हो कि तुम मुझसे कुछ छिपा नहीं सकती। फिर क्यूं ये नाकाम कोशिश कर रही हो !" 
सुषमा ने जैसे सीधे पीहू की दुखती रग पर हाथ रखा ।
"कल रात शादी में गयी थी। वहां वो मिला।" पीहू ने नीचे घास की तरफ देखते हुए कहा 
"वो! कौन वो ?" सुषमा ने हैरानी से पूछा
"हर्षद । इतने सालों बाद भी उसकी आँखों में देखा तो वही बेकरारी , वही मुहब्बत नजर आई। मगर अब उसमे शिकायत भी शामिल थी। "
"हर्षद ! यह नाम पहले भी तेरे मुंह से सुना है। पूछा भी कई बार। मगर तुम हर बार बात को घुमा देती।बताओ पीहू कौन है ये हर्षद ?" 
"हर्षद हमारा दूर का रिश्तेदार है , बुआ के ससुराल के तरफ से।" 
"पूरी बात बता। हर्षद तुम्हें कहां मिला? कैसे मुलाकात हुई ?"
"बात मेरी शादी से पहले की है। किसी रिश्तेदार की शादी में मिले थे हम। वह शादी में ही शामिल होने आगरा से आया था। पहली नज़र में ही हमने एक दूसरे को मन ही मन पसंद कर लिया।  वो जब तक यहां रहा तब तक रोज़ किसी न किसी बहाने से घर आ जाता। करीब आठ दिनो तक यही  सिलसिला चलता रहा। रिश्तेदारी होने की वजह से माँ और बाऊजी ने भी उसकी आवभगत की। इतने दिनों में घरवालों के बहुत करीब आ गया तो फोन नंबर भी ले लिया उसने। मगर कभी न तो वो अपने दिल की बात कह पाया न ही मै ।" 
पीहू जैसे बीते दिनों में वापस चली गई उसकी आँखों के सामने वही दृश्य थे। उसने कहना जारी रखा ।
"फिर शुरू हुआ फ़ोन पर बातो का सिलसिला। न सिर्फ मुझसे बल्कि बाकी घरवालों से भी उसकी बात होती। बातें सामान्य ही होती। मगर उसने कभी नहीं कहा कि मुझसे प्यार करता है। "
"करीब एक साल बाद फिर शादी में मिलने का मौका मिला। मगर इस बार वह अकेला नहीं आया। साथ में उसके घरवाले भी थे। शायद अपने घरवालों से बात कर ली थी हर्षद ने। इसलिए शादी की रस्में पूरी होने के बाद उसके माता-पिता घर आये। हमारे रिश्ते की बात करने। मगर बाऊजी ने अभी छोटी है कह कर इनकार कर दिया।" 
"ओह ! मगर जब तुम्हारा रिश्ता साहिल के साथ तय हुआ ,तब बाऊजी से तुम भी तो कह सकती थी ना। कि मुझे हर्षद से प्यार है !" 
"कैसे कहती सुषमा ?और क्या कहती ? हर्षद ने तो कभी अपने प्यार का इजहार किया ही नहीं। और जिस दिन उसके घरवाले मेरा हाथ मांगने आये थे उस दिन माँ ने मुझे घर से बाहर भेज दिया। क्योंकि उन्हें इस बात का अंदाजा शायद पहले से था।" 
"मगर बाद में तो पता चल गया था ना तुम्हें! तब कह देती। "
"यह बात मुझे शादी के बाद पता चली " ठंडी सांस भरते हुए पीहू ने कहा "एक दिन माँ के मुंह से ही बातो ही बातो में बात निकल गई।" 
रुआंसे स्वर में पीहू ने कहना जारी रखा "हम दोनों ने ही एक दूसरे को पसंद किया था। शायद यही बात मेरे पुरानी सोच रखने वाले बाऊजी को नागवार गुजरी थी।" 
"ओहह ! फिर ! क्या उसके बाद उसने फिर फोन नहीं किया?" 
"नहीं ,उसने उम्मीद फिर भी नहीं छोडी। वह फोन करता रहा और अब मुझसे ज्यादा वो माँ से बातें करता।
"कुछ महीनो तक यह सिलसिला चलता रहा। एक दिन उसने बताया वह कुछ दिनों के लिए दोस्तों के साथ बाहर जा रहा है। और शायद बाहर से वह फ़ोन न कर पाये । और उसका कोई फोन न आया। उन्हीं दिनों में साहिल का रिश्ता आया और हां हो गयी।" 
"फिर! हर्षद को कैसे और कब बताया?" सुषमा ने पूछा 
"सगाई वाले दिन ही हर्षद का फोन आया। जब मैंने उसे बताया कि आज मेरी सगाई है। उसे विश्वास ही न हुआ। वह बार- बार अपनी कसम देकर माँ से और मुझ से पूछता रहा। कुछ देर बाद उसने फोन रख दिया। और फिर कभी दुबारा फोन नहीं किया।" पीहू की आवाज में पीडा उभर आई 
कुछ देर रुककर कहा "कल शाम इतने सालों बाद वह शादी में मिला। मुझे लगा भूल चुका होगा वो सबकुछ। मगर जब उसने मेरी आँखों में आँखें डालते हुए पूछा
"कैसी हो पीहू ! अब तो खुश हो ना तुम ?" तब उसकी आँखों में दर्द के साथ कई सवाल थे। 
मैं इससे पहले कि कोई जवाब देती सहसा उसने कहा "मेरे प्यार को क्यूं ठुकरा दिया तुमने ?इतनी तो वजह बता दो। " 
"तुमने कभी अपने प्यार का इजहार किया था हर्षद ? दुनिया भर की बातें की , क्या कभी कहा कि प्यार करते हो ? शादी करना चाहते हो ?" 
"कहने से ही प्यार जाहिर होता है पीहू ? क्या कभी तुमने मेरी आँखों से अहसास नहीं हुआ ?" 
"मैं निरउत्तर हो गयी उसके सामने "
"मैंने तो रिश्ता भी भिजवाया था। पर तुम्हारे बाऊजी ने अभी छोटी है कहकर मना कर दिया था।"
" सच मानो हर्षद मुझे तो पता भी नहीं  कि तुम्हारे घर से रिश्ता आया है। वरना मैं बाऊजी को मना लेती। मुझे तो शादी के बाद यह बात पता चली। " 
आँखों में दर्द का सैलाब लिये वो मुझे कुछ देर तक देखता रहा। फिर भर्राई हुई आवाज़ में बोला "इस जन्म में तो तुम्हें अपना न बना सका पीहू। मगर अगले जन्म में तुम्हें अपना बनाकर ही दम लूंगा। "
"इतना कहकर वो बिना मेरी तरफ मुडे चला गया । उसकी वो दर्द भरी आँखें मुझसे भुलायी नहीं जा रही सुषमा। " पीहू की आवाज़ में अथाह पीडा थी।
सुषमा ने जब पीहू के हाथ पर हाथ रख उसे हिम्मत देनी चाही तब सुषमा के हाथ पर पीहू की आँखों के दो मोती थे।
"सुषमा माँ-बाऊजी तो सब समझ रहे थे ना ! गर वो मेरी शादी हर्षद से कर देते तो क्या हो जाता ......!!
प्रिया

1 टिप्पणी:

  1. ह्म्म्म
    सच है मोहब्बत शब्दो की नही एहसास की मोहताज रहती है

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