सोमवार, 14 दिसंबर 2015

सत्संग..कितना सही कितना गलत

अनादिकाल से ही भारत में सत्संग करने की, गुरु बनाने की प्रथा चली आ रही है। हमें घर के बड़े बुजुर्गों से अक्सर यह सुनने मिलता के हम सत्संग में जा रहे हैं। या सत्संग की बातें बताते जो सुनने में काफी अच्छी भी लगती। तब सत्संग में ज्यादातर सिर्फ बड़े बुजुर्ग ही जाते जिन्होंने अपने सांसारिक दायित्व निभा लिए हों और अब संतों की शरण में जाकर मन की शान्ति चाहते हैं।  किन्तु अब समय ने करवट ली है और अब सत्संग में सिर्फ बुजुर्ग ही नहीं बल्कि नोजवान यहाँ तक की बच्चे भी जाते हैं क्योंकि जैसे-जैसे समाज तरक़्क़ी करता जा रहा है वैसे-वैसे आदमी की उम्र पहले की अपेक्षा कम हो गयी है। क्योंकि अब समय के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने का तनाव भी होता है और ज्यादा तनाव के चलते कई बीमारियां छोटी उम्र में ही घेर लेती हैं। इसलिए अब सत्संग केवल बुजुर्गों के लिए नहीं होता। मन की शान्ति युवा वर्ग को भी चाहिए आज सत्संग में भी लोगों की काफी तादात देखी जाती है। और उनमें भी औरतों की संख्या आज की तारीख में ज्यादा है।
किन्तु एक प्रश्न मेरे दिमाग में सदैव कौंधता रहता है। हो सकता है कई लोग मुझसे इत्तेफाक भी रखते हों किन्तु एक बार मेरी इन बातों पर गौर जरूर करें।
"आज के समय में क्या सत्संग वाकई सत्संग होता हैं?"
मैंने जहाँ तक अपनी दादी को देखा तो वो सीधे साधे कपडे पहनकर सत्संग जाती। वहां से कुछ भगवान् की, ज्ञान की और संयम की बातें सुनकर आती और हमें बताती। मैं ये कतई नहीं कहती के आज के सत्संग में ये सब नहीं सिखाया जाता। सिखाया आज भी वही जाता है किन्तु क्या सीखने वाले वही सीखते हैं ? ये बात गौर करने लायक है।
कई पुरुष अभी इस मामले में काफी पीछे हैं किन्तु महिलाओं की भरमार देखी जाती है सत्संगों में। आज सत्संग के नाम पर दिखावा आडम्बर और घूमने का चलन चल पड़ा है। और तो और नेशनल कंपनी की तरह इनकी भी अलग-अलग शहरों में शाखाएं हो गयी हैं। कई बार एक शहर के लोग दूसरे शहरों में जाते हैं सत्संग करने और दूसरी बार वो लोग इनके शहरों में आते हैं। और जो मेहमान बनकर आते हैं उनकी मेजबानी यहाँ के सत्संग वाले करते हैं। और वो जिम्मेदारी, जैसे इनके रुकने की, खाने-पीने की व्यवस्था इस शहर के सत्संग सुनने वालों को करनी पड़ती है। कई जगह यह नहीं देखा जाता के सामने वाली की आर्थिक स्थिति क्या है! वो मदद करने में सक्षम है भी के नहीं! उसे गुरु के नाम पर कहा जाता है आपको यह करना ही पड़ेगा। वैसे ही अगर कोई साथ बाहर जाने के लिए तैयार न हो तो उसपर साथ चलने के लिए दबाव डाला जाता है। अगर उसके पति ने मना कर दिया हो तो सत्संग की कुछ औरते पहुंच जाती है उसके पति को मनाने अब पति बेचारा क्या कहे इतनी औरतों को! सो वह हां कह देता है। अब वह उस समय तो नहीं किन्तु बाद में अपनी भड़ास तो निकलेगा ही। तो यह सत्संग घर बनाने के काम आया या घर बिगाड़ने के यह अब हमे खुद तय करना है।
मैं नाम लेकर किसी पंथ के लोगों की भावनाओं को आहात नहीं करना चाहती किन्तु किसी सत्संग में तो यहाँ तक कहते हैं के भगवान कोई है ही नहीं। उनका गुरु ही उनका भगवान है। उस सत्संग पर जाने वाले घर में न तो किसी भगवान् की तस्वीर रखते हैं न ही कभी किसी मंदिर में जाते हैं और तो और अगर आप उन्हें प्रसाद कहकर देंगे तो वो लेने से मना कर देंगे हां अगर कुछ मीठा हुआ और उनका मन ललचाया तो वो मिठाई है , कहकर खा लेंगे लेकिन प्रशाद कहने पर नहीं लेंगे। वह अपने गुरु को ही भगवन मानते हैं। अगर उनके गुरु जी उनके आस पास के शहरों में सत्संग करने आ रहे हैं तो वो हर दिन के हिसाब से नए कपडे खरीदती हैं बल्कि खासतौर पर वेस्टर्न कपडे पहनकर जाती हैं। यही नहीं एक दूसरे के कपड़ों के बारे में बोलना और एक दूसरे को निचा दिखाना वहां की औरतों का चलन है। वो औरतें जो घर में एक चाय का कप तक नहीं बनाती उसपर भी बहु पर आश्रित होती हैं। घर में काम करने के लिए जिन्हें घुटनों का दर्द व् कई प्रकार तकलीफें होती हैं वो सत्संग पे झाड़ू लगाती, चप्पल उठाती, यहाँ तक के ईंटें तक ढोती देखी जाती हैं। पूछने पर कहती हैं "गुरु सेवा" कर रहें हैं। और वहां सेवा से वापस आने पर अक्सर घरों में देर तक सोती मिलेगी और पतिदेव को यह कहते हुए पायी जायेगी " आज तो गुरु सेवा में थक गयी हूँ खाना बाहर से ही लेते आना"। यह कैसी गुरु सेवा है? यह कैसा सत्संग है? जो आपको अपने पत्नी धर्म से अपने घर के प्रति जिम्मेदारियों से यहाँ तक के अपने हिन्दू धर्म में माने जाने वाले देवी देवताओं से या यूँ कहें के हिन्दू धर्म से ही दूर करता है। जहाँ आप मन की शान्ति पाने नहीं अपने कपडे दिखाने आडम्बर करने जाते हैं !!
वहीँ एक पंथ में तो यहाँ तक कहा जाता है की पति-पत्नी का रिश्ता होता ही नहीं रिश्ता सिर्फ भाई-बहन का होता है। वहां जाने वाले लोगों का तो इतना ब्रेन वाश किया जाता है के उस सत्संग पर जाने वाले कई जोड़ो को देखा है वो भाई-बहन की तरह जिंदगी जीते हैं। अब पति-पत्नी दोनों जाते हों तो बात अलग है। किन्तु अगर दोनों में से किसी एक ने भी गर वो पंथ अपनाया तो दूसरे साथी की जिन्दगी ही बेज़ार हो जाती है। उसके बाद या तो अपराध जन्म लेता है या फिर कुंठा अब दोनों ही हालात में घर तो टूटा ही। फिर वही बात सत्संग घर बनाने के लिए है या तोड़ने के लिए !!!
मेरा कतई ये कहना नहीं है के आप सत्संग में न जाएँ। जरूर जाएँ लेकिन जहाँ आडम्बर हो, जहाँ आपको आपके धर्म से ही डिगाया जाए, जहाँ आपकी आर्थिक स्थिति को आपकी मजबूरियों को न समझा जाए, जहाँ जाने से आपके घर में शान्ति नहीं अपितु कलह जन्म ले ऐसे सत्संग में जाने से न जाना ही अच्छा।
प्रिया वच्छानी

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