प्रिय बेटी,
आज भाववश मैं तुम्हें यह पत्र लिख रही हूँ। तुमने अब तक इस दुनियां में अपना कदम तो नहीं रखा पर मैं अपने उदर में तुम्हारी किलकारियों को महसूस कर रही हूँ। मेरा मन तुम्हारे आगमन से बेहद प्रफुल्लित है ऐसा महसूस हो रहा है मानो ईश्वर ने संसार की समस्त खुशियों से मेरी झोली को भर दिया है। जानती हो ईश्वर ने अपने बाद स्त्री को ही सृजन की क्षमता दी है। और इस खुशी इस अहसास का शब्दों में वर्णन करना नामुमकिन है। किन्तु कहावत है जब हम अत्यंत खुश होते हैं तब हमारा मन कहीं न कहीं आशंकित भी रहता है। खुशी के साथ भय भी अपनी जगह बना लेता है। आज मैं भी कुछ वैसा ही महसूस कर रही हूँ मेरा मन अपार खुश होने के साथ-साथ थोडा सहमा हुआ सा भी है। न-न सहमा हुआ इसलिए नहीं है के तुम्हारे पापा तुम्हें इस दुनियां में आने से रोकेंगे या उन्हें तुम्हारे आने की ख़ुशी नहीं होगी बल्कि वो बहुत खुश होंगे तुम्हारे आगमन पर। उनके विचार से तो बेटी स्वयम माँ दुर्गा, माँ लक्षमी का रूप है। बेटियों का महत्त्व तुम्हारे पापा बखूबी समझते हैं व दुनियां को भी समझाते हैं "बेटी है तो कल है वरना जीवन विफल है।" यह तो जैसे उनका स्लोगन बन गया है। हाँ हो सकता है घर के बड़े बुजुर्गों को तुम्हारे आने पर उतनी खुशी न हो क्योंकि पुराने रूढ़िवादी और पुरुषसत्तात्मक विचारों के हैं वो किन्तु तुम चिंता मत करना तुम्हारे पापा और मैं हैं न सब संभाल लेंगे।
मेरे मन में डर तो आज कल बच्चीयों पर बढ़ते अत्याचारों को लेकर है। बेटी छोटी हो या बड़ी उसपर मंडराते बलात्कार के काले बादलों का है। आज के युग में बाहर क्या बच्चियां अपने घरों में भी सुरक्षित नहीं हैं। हर दिन अखबार में छोटी-छोटी बच्चीयों के साथ कभी अपने रिश्तेदारो द्वारा, कभी स्कूल में तो कभी बस या वेन में होते इस घृणित कृत्य को पढ़कर मन दहल जाता है। कैसे लोग इतने हैवान हो सकते हैं जो क्षणिक सुख के लिए किसी बच्ची का जीवन तक तबाह कर देते हैं? क्यों उन्हें उस बच्ची में अपने बेटी या बहन नहीं दिखाई देती? क्यों उन्हें उसे होने वाले दर्द का अहसास नहीं होता? वो बच्ची को बच्ची या इंसान न समझकर क्यों उसे सिर्फ अपनी हवस पूरी करने की वस्तु मात्र समझते हैं।
दूसरा डर है आज कल युवाओं में बढ़ते आत्महत्या के प्रचलन को लेकर। जीवन में ज़रा सी कठिनाई आने पर, कड़वे अनुभव होने पर, कभी परीक्षा में अनुत्तीर्ण होने पर, या कभी प्रेमी द्वारा छोड़े जाने पर बच्चे अपना मनोबल खो देते हैं और उन्हें लगता है अब जीवन को ख़त्म करने के अलावा उनके पास कोई और चारा ही नहीं रह गया। और मानसिक अवसाद में आकर वो ऐसा कदम उठा लेते हैं जिसकी कोई भी माँ-बाप अपने जीवन में कल्पना भी नहीं कर सकते तो उसे सहन करना कितना कठिन होता होगा!!
तीसरा डर है शादी के बाद बहुओं पर होते अत्याचार को लेकर। माँ-बाप चाहे अपनी हैसियत से ज्यादा बच्चियों को देकर विदा करें किन्तु फिर भी कहीं-कहीं दहेज़ के लोभियों की तृष्णा कभी ख़त्म ही नहीं होती और वो तरह-तरह से बच्चियों को प्रताड़ित करते हैं जब माँ-बाप उनकी ख्वाहिशे नहीं पूरी कर पाते तब वो इतने घृणित हो जाते हैं के बच्चियों को जिन्दा आग के हवाले कर देते हैं। रसोई में काम करते समय जब हमारे छोटी सी ऊँगली भी जल जाती है तो हमें बहुत तकलीफ होती है तो जब किसी को आग के हवाले कर दिया जाता होगा तो उसकी तकलीफ की कल्पना करना भी बहुत मुश्किल है।
मैं यह सब बता कर तुम्हें डरा नहीं रही मेरी बच्ची, बल्कि जीवन में आने वाले ऐसे उतार चढ़ाव से वाकिफ करवा रही हूँ। ईश्वर न करे कभी तुम्हारे जीवन में कोई भी ऐसी परिस्थिती आये। किन्तु अगर आ भी जाए तो तुम उन कठिनाइयों का डटकर मुकाबला कर सको इसके लिए अभी से तुम्हें तैयार कर रही हूँ। महाभारत में जैसे अभिमन्यु ने सुभद्रा के पेट में ही चक्रव्यूह को भेदना सीख लिया था वैसे ही मैं चाहती हूँ तुम्हें अभी से परिस्थितियों से निपटना सिखाती जाऊं। ईश्वर न करे तुम्हें जिंदगी में कभी किसी तकलीफ का सामना करना पड़े किन्तु अगर कभी ऐसा कठिन समय आये तो तुम मानसिक रूप से तैयार रहो इसलिए आज मैं तुमसे यह सारी बातें सांझा कर रही हूं।
मेरी बच्ची मैं अपनी पूरी कोशिश करुँगी तुम पर कभी किसी राक्षस का साया भी न पड़े। पर अगर कभी ऐसा हो तो तुम कभी किसी से डरना मत व अपनी माँ को अपना दोस्त समझना कोई भी बात मुझसे मत छुपाना। कभी किसी का छूना बुरा लगे या तुम्हें कोई गलत तरीके से शरीर के नाजुक हिस्सों को छुए तो कड़ाई से उसका विरोध करना व बिना किसी डर के हमें बताना।
बेटी मैं तुम्हें आत्म रक्षा के गुण जरूर सिखाऊंगी ताकि कभी ऐसा वक्त आने पर तुम्हें मदद के लिए किसी की सहायता की आवशकता न पड़े बल्कि अपनी रक्षा स्वयः कर सको किन्तु ईश्वर न करे कभी गर ऐसा हो जाए तो घबराना मत तुम्हारी माँ हर कदम पर तुम्हारे साथ है।
एक बात हमेशा याद रखना बलात्कार की शिकार लड़की कभी गलत नहीं होती गलत होता है वह घृणित मानसिकता वाला आदमी। जो चंद पलो के आवेश में आकर ऐसा कार्य कर जाता हैं। हम उन कई माँ-बाप की तरह नहीं हैं जो समाज के डर से चुप बैठ जाएँ बल्कि हम उस हैवान को सजा दिलाकर तुम्हें न्याय जरूर दिलवाएंगे ताकि उसे सबक मिले व ऐसी सोच रखने वालो को शिक्षा ताकि फिर कोई हैवान किसी भी बच्ची की जिंदगी खराब न कर सके
बेटी पढ़ाई के दौरान कभी परीक्षा में मनचाहा परिणाम न भी आये तो भी कभी हिम्मत न हारना क्योंकि ये आखरी इम्तेहान तो नही इस बार न सही अगली बार मेहनत करके अच्छा परिणाम लाया जा सकता है और तुम अगर पढ़ाई में अव्वल न भी रही तो क्या! हर बच्चे में अपना-अपना हुनर होता है। तुम्हारी जिस काम में रूचि हो तुम वो करना जीवन के हर फैसले में मैं और तुम्हारे पापा सदैव तुम्हारा साथ देंगे।
जीवन में कभी तुम्हारे द्वारा चुना हुआ साथी अगर तुम्हारा साथ छोड़कर चला जाए या किसी वजह से अलगाव हो जाए तो अपना संतुलन मत खोना क्योंकि जो तुम्हें छोड़कर गया वो तुम्हारा कभी था ही नहीं वरना जाता क्यों? यह याद रखना उस आदमी से कहीं ज्यादा प्यार तुमसे तुम्हारे माँ-पापा करते हैं। वो तो तुम्हारे बिना जी लेगा किन्तु तुम्हारे माँ-पापा जो सिर्फ तुम्हारे लिए जी रहे हैं वो तुम्हारे बिना न जी पाएंगे। इसलिए बेटी कभी भी किसी भी मानसिक दबाव में आकर ऐसा कदम मत उठाना जिससे तुम्हारे माँ-पापा की जिंदगी उनसे छिन जाए। बल्कि उस समस्या को हमारे साथ बांटना क्योंकि अनुभव से बड़ी से बड़ी समस्या का हल आसानी से निकल आता है।
एक बात हमेशा याद रखना जैसे- जैसे तुम बड़ी होगी तुम्हारा मित्र वर्तुल बढ़ता जाएगा यह जरूरी नहीं हम जिन्हें मित्र चुनें वह अच्छे ही हों, कई बार हमसे मित्र चुनने में भी गलती हो जाती है। कई ऐसे मित्र भी बन जाते हैं जो मित्र बनाने के लायक ही नहीं होते हैं या फिर उन्हें नशे की लत होती है, ऐसे मित्र अपने साथ दूसरों को भी ड्रग्स या स्मैक की आदत डालते हैं। पहले पहल तो वो कहेंगे एक बार ट्राय करो कुछ नहीं होता या बड़े लुभावने शब्दों का इस्तेमाल करते हैं। किन्तु बेटी कभी ऐसे मित्रों की बातों में आकर खुद को बुरी आदतों का शिकार मत बनाना, उन्हें साफ़ मना कर देना और ऐसे मित्रों से दूरी बनाये रखना ही बेहतर होता है। और कभी गलती से ऐसी आदत पड़ भी जाये तब भी हम पर विश्वास रखकर हमें बताना क्योंकि दुनियां में कोई ऐसी आदत नहीं जो छुड़ाई न जा सके। प्यार और विश्वास हर समस्या से बाहर ले आता है।
बेटी एक बात सदैव याद रखना बेटियां शादी के बाद पराये घर जरूर जाती हैं किन्तु वो माँ-बाप के लिए कभी परायी नहीं होती। मैं तुम्हें ये संस्कार तो अवश्य दूंगी के ससुराल में सास-ससुर की पति की सेवा करना तुम्हारा धर्म है, देवर को भाई और ननद को बहन की तरह समझना तुम्हारा कर्तव्य है। किन्तु अपना आत्मसमान बनाये रखना भी बहुत जरूरी है। अपने आत्मसम्मान की बली देकर कभी कोई रिश्ता नहीं निभाया जा सकता।
बेटी छोटी-मोटी बातें तो हर घर में होती रहती हैं उन्हें ज्यादा तूल मत देना। जैसे कोई गलती करने पर माँ-बाप अपने बच्चों को डांटते हैं और बच्चे उसे ज्यादा देर तक मन में नही रखते वैसे ही ससुराल में अगर सास या ससुर तुम्हें किसी गलती पर डांटे तो उसे भी कड़वी याद की तरह अपने मन मे न बसा लेना।
ससुराल में कोई भी समस्या हो तो पहले अपनी तरफ से उन्हें सुलझाने का पूरा प्रयत्न करना किन्तु जब वो न सुलझ पाएं तो हमसे छुपाना मत। और हाँ अपने ऊपर अत्याचार कभी मत सहन करना।
सास-ससुर माँ-पिता समान व पति परमेश्वर जरूर होता है किन्तु हाथ उठाने का हक़ उन्हें परम पिता परमेश्वर ने भी नहीं दिया है। किसी पर जुल्म करना गुनाह है तो जुल्म सहना उससे भी बड़ा गुनाह है। सामाजिक रीत रिवाज़ निभाते हुए हम तुम्हें विदा तो जरूर करेंगे किन्तु हम तुम्हें विदाई नहीं दे रहे, तुम्हारे माँ-पापा हर कदम तुम्हारे साथ हैं यह बात सदैव याद रखना।
यह एक माँ के मन का डर है जो मैंने तुम्हारे साथ बांटा किन्तु साथ ही एक दृढ़ निश्चय भी है के मैं अपनी बेटी के साथ कभी कोई अन्याय नहीं होने दूँगी।
अंत में बस यही कहूँगी तुम भी अपने जीवन में बेटी को जन्म जरूर देना क्योंकि बेटियों के बिना तो इस संसार की कल्पना भी नहीं की जा सकती लेकिन हां उसे भी निडर व आत्मनिर्भर भी जरूर बनाना।
प्रिया वच्छानी
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