हममें से कई लोग कई सारे धार्मिक कार्य करते हैं। जैसे पूजा-पाठ , पशु-पक्षियों के दाना-पानी की व्यवस्था , गरीबों की मदद। किन्तु फिर भी कभी-कभी हमारे मन में शांति की अनुभूति नहीं होती। हम आंतरिक सुकून नहीं महसूस करते।
क्योंकि हम जानते है कि कहीं न कहीं जाने-अनजाने में हमने किसी के साथ बुरा व्यवहार किया है। या किसी का दिल दुखाया है। ये कतई जरुरी नहीं कोई बड़ी बात ही हो। कभी छोटी-छोटी बातें भी मन को विचलित कर देती हैं। फिर धर्म-कर्म करने के पश्चात भी हमें सुकून प्राप्त नहीं होता। मन पश्चाताप की अग्नि में जलता रहता है। हममें से कई लोग निरंतर उस अग्नि में जलते रहते हैं। धर्म-कर्म बढ़ा देते हैं। किन्तु जानते हुए भी कि उसका समाधान क्या है। हम उस रास्ते पर नहीं चलते। या यूँ कहें के चलना ही नहीं चाहते। क्योंकि इस रास्ते पर चलने के लिए बहुत हिम्मत की जरुरत होती है । अपने अहंकार को एक तरफ रखकर खुद की गलती का अहसास करना पड़ता है। रिश्तों को बचाने के लिए झुकना पड़ता है।
यद्यपि इस झुकाव से हमें कोई नुकसान नहीं होता न ही हम किसी के आगे छोटे हो जाते हैं। परंतु फिर भी न जाने क्यों कई बार अपने अहम को आगे रखते हुए हम रिश्तों को भी तोड़ देते है किन्तु एक बार भी क्षमा नहीं मांगते। यह जानते हुए भी कि गलती हमारी है फिर भी सॉरी जैसे छोटे से शब्द के आगे हमारा बड़ा सा अहम आ जाता है।
"सॉरी " इस शब्द का हम सभी दिन में दो चार बार तो आसानी से प्रयोग कर लेते हैं । जैसे किसी को हल्का सा पैर लग गया तो झट से मुंह से सॉरी निकल जाता है। किसी से टकरा गए तब ये भी झट से सॉरी।तब हमारा अहंकार आड़े नहीं आता। क्योंकि तब हम जानते है की इस शब्द का उतना मोल नहीं इस समय । लेकिन जब सही मायनों में सॉरी कहने की स्थिति आती है तब हमारे मुँह से यह छोटा सा शब्द नहीं निकलता। या फिर निकलता भी है तो वो सिर्फ औपचारिकता वश।
मुझे यह बात कभी समझ नहीं आई कि एक बार सॉरी बोलने से या अपने द्वारा की गई गलती स्वीकार करने से अगर रिश्तों की दरारे भर जाती हैं तो यह शब्द बोलने में क्या दिक्कत है? इसमें अहम् का क्या काम ? और फिर जब हम किसी का दिल दुखाने में, किसी को अपशब्द बोलने में।, किसी के साथ जाने अनजाने में बुरा व्यवहार करते समय शर्म नहीं आई । उस समय हमारा अहंकार आड़े नहीं आया तो माफ़ी मांगते समय क्यों हम इनसब चीज़ो को आगे ले आते हैं?
कोई हमसे छोटा हो या बड़ा अगर हमसे गलती हुई है। अगर हमने किसी के सम्मान को ठेस पहुचाई है । या उसका दिल दुखाया है। और हमे इस बात की ग्लानि भी है।हम जानते है कि कहीं न कहीं गलती हमारी ही है । तो इस आत्मग्लानी में जलने से तो अच्छा है क्षमा माँगना। तो फिर माफ़ी मांगने से परहेज क्यों? और फिर माफ़ी मांगने से हम छोटे नहीं बल्कि सामने वाले की नज़र में और बड़े हो जाएंगे। इससे हमारा ओहदा कम नहीं होता बल्कि हम न सिर्फ रिश्ते बचाते है , सामने वाले के दिल में अपनी इज़्ज़त बढ़ाते है बल्कि आत्मग्लानी से भी मुक्त हो जाते हैं।
इसलिए कभी भी किसी को अपशब्द बोलने से पहले जरूर दो बार सोचें । लेकिन सॉरी बोलने में एक मिनट की भी देर न लगाएं।
प्रिया वच्छानी
उल्हासनगर/मुंबई
शनिवार, 13 जून 2015
सॉरी
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