पीहू ने तैयार हो कर शौफर को गाडी निकालने के लिये आवाज़ लगायी। और महरी से कहा "सीमा अगर साहब आ जाये तो कहना मैं सुषमा से मिलने गयी हूं ।"
पीहू अच्छी तरह जानती थी कि जब उसका मन उदास होता तो सुषमा के अलावा कोई और न था जिससे वो अपने मन की बात बता सकती। इसलिए वह सीधे सुषमा से मिलने गई ।
दोनो बाहर गार्डन में बैठी चाय पी रही थी। सुषमा ने पीहू की उदासी को भापते हुए कहा "क्या बात है ? आज इतनी बुझी-बुझी सी क्यूं हो?"
"कुछ ख़ास नही,बस तुमसे मिलने का मन किया तो चली आई "
"तुम अच्छी तरह से जानती हो कि तुम मुझसे कुछ छिपा नहीं सकती। फिर क्यूं ये नाकाम कोशिश कर रही हो !"
सुषमा ने जैसे सीधे पीहू की दुखती रग पर हाथ रखा ।
"कल रात शादी में गयी थी। वहां वो मिला।" पीहू ने नीचे घास की तरफ देखते हुए कहा
"वो! कौन वो ?" सुषमा ने हैरानी से पूछा
"हर्षद । इतने सालों बाद भी उसकी आँखों में देखा तो वही बेकरारी , वही मुहब्बत नजर आई। मगर अब उसमे शिकायत भी शामिल थी। "
"हर्षद ! यह नाम पहले भी तेरे मुंह से सुना है। पूछा भी कई बार। मगर तुम हर बार बात को घुमा देती।बताओ पीहू कौन है ये हर्षद ?"
"हर्षद हमारा दूर का रिश्तेदार है , बुआ के ससुराल के तरफ से।"
"पूरी बात बता। हर्षद तुम्हें कहां मिला? कैसे मुलाकात हुई ?"
"बात मेरी शादी से पहले की है। किसी रिश्तेदार की शादी में मिले थे हम। वह शादी में ही शामिल होने आगरा से आया था। पहली नज़र में ही हमने एक दूसरे को मन ही मन पसंद कर लिया। वो जब तक यहां रहा तब तक रोज़ किसी न किसी बहाने से घर आ जाता। करीब आठ दिनो तक यही सिलसिला चलता रहा। रिश्तेदारी होने की वजह से माँ और बाऊजी ने भी उसकी आवभगत की। इतने दिनों में घरवालों के बहुत करीब आ गया तो फोन नंबर भी ले लिया उसने। मगर कभी न तो वो अपने दिल की बात कह पाया न ही मै ।"
पीहू जैसे बीते दिनों में वापस चली गई उसकी आँखों के सामने वही दृश्य थे। उसने कहना जारी रखा ।
"फिर शुरू हुआ फ़ोन पर बातो का सिलसिला। न सिर्फ मुझसे बल्कि बाकी घरवालों से भी उसकी बात होती। बातें सामान्य ही होती। मगर उसने कभी नहीं कहा कि मुझसे प्यार करता है। "
"करीब एक साल बाद फिर शादी में मिलने का मौका मिला। मगर इस बार वह अकेला नहीं आया। साथ में उसके घरवाले भी थे। शायद अपने घरवालों से बात कर ली थी हर्षद ने। इसलिए शादी की रस्में पूरी होने के बाद उसके माता-पिता घर आये। हमारे रिश्ते की बात करने। मगर बाऊजी ने अभी छोटी है कह कर इनकार कर दिया।"
"ओह ! मगर जब तुम्हारा रिश्ता साहिल के साथ तय हुआ ,तब बाऊजी से तुम भी तो कह सकती थी ना। कि मुझे हर्षद से प्यार है !"
"कैसे कहती सुषमा ?और क्या कहती ? हर्षद ने तो कभी अपने प्यार का इजहार किया ही नहीं। और जिस दिन उसके घरवाले मेरा हाथ मांगने आये थे उस दिन माँ ने मुझे घर से बाहर भेज दिया। क्योंकि उन्हें इस बात का अंदाजा शायद पहले से था।"
"मगर बाद में तो पता चल गया था ना तुम्हें! तब कह देती। "
"यह बात मुझे शादी के बाद पता चली " ठंडी सांस भरते हुए पीहू ने कहा "एक दिन माँ के मुंह से ही बातो ही बातो में बात निकल गई।"
रुआंसे स्वर में पीहू ने कहना जारी रखा "हम दोनों ने ही एक दूसरे को पसंद किया था। शायद यही बात मेरे पुरानी सोच रखने वाले बाऊजी को नागवार गुजरी थी।"
"ओहह ! फिर ! क्या उसके बाद उसने फिर फोन नहीं किया?"
"नहीं ,उसने उम्मीद फिर भी नहीं छोडी। वह फोन करता रहा और अब मुझसे ज्यादा वो माँ से बातें करता।
"कुछ महीनो तक यह सिलसिला चलता रहा। एक दिन उसने बताया वह कुछ दिनों के लिए दोस्तों के साथ बाहर जा रहा है। और शायद बाहर से वह फ़ोन न कर पाये । और उसका कोई फोन न आया। उन्हीं दिनों में साहिल का रिश्ता आया और हां हो गयी।"
"फिर! हर्षद को कैसे और कब बताया?" सुषमा ने पूछा
"सगाई वाले दिन ही हर्षद का फोन आया। जब मैंने उसे बताया कि आज मेरी सगाई है। उसे विश्वास ही न हुआ। वह बार- बार अपनी कसम देकर माँ से और मुझ से पूछता रहा। कुछ देर बाद उसने फोन रख दिया। और फिर कभी दुबारा फोन नहीं किया।" पीहू की आवाज में पीडा उभर आई
कुछ देर रुककर कहा "कल शाम इतने सालों बाद वह शादी में मिला। मुझे लगा भूल चुका होगा वो सबकुछ। मगर जब उसने मेरी आँखों में आँखें डालते हुए पूछा
"कैसी हो पीहू ! अब तो खुश हो ना तुम ?" तब उसकी आँखों में दर्द के साथ कई सवाल थे।
मैं इससे पहले कि कोई जवाब देती सहसा उसने कहा "मेरे प्यार को क्यूं ठुकरा दिया तुमने ?इतनी तो वजह बता दो। "
"तुमने कभी अपने प्यार का इजहार किया था हर्षद ? दुनिया भर की बातें की , क्या कभी कहा कि प्यार करते हो ? शादी करना चाहते हो ?"
"कहने से ही प्यार जाहिर होता है पीहू ? क्या कभी तुमने मेरी आँखों से अहसास नहीं हुआ ?"
"मैं निरउत्तर हो गयी उसके सामने "
"मैंने तो रिश्ता भी भिजवाया था। पर तुम्हारे बाऊजी ने अभी छोटी है कहकर मना कर दिया था।"
" सच मानो हर्षद मुझे तो पता भी नहीं कि तुम्हारे घर से रिश्ता आया है। वरना मैं बाऊजी को मना लेती। मुझे तो शादी के बाद यह बात पता चली। "
आँखों में दर्द का सैलाब लिये वो मुझे कुछ देर तक देखता रहा। फिर भर्राई हुई आवाज़ में बोला "इस जन्म में तो तुम्हें अपना न बना सका पीहू। मगर अगले जन्म में तुम्हें अपना बनाकर ही दम लूंगा। "
"इतना कहकर वो बिना मेरी तरफ मुडे चला गया । उसकी वो दर्द भरी आँखें मुझसे भुलायी नहीं जा रही सुषमा। " पीहू की आवाज़ में अथाह पीडा थी।
सुषमा ने जब पीहू के हाथ पर हाथ रख उसे हिम्मत देनी चाही तब सुषमा के हाथ पर पीहू की आँखों के दो मोती थे।
"सुषमा माँ-बाऊजी तो सब समझ रहे थे ना ! गर वो मेरी शादी हर्षद से कर देते तो क्या हो जाता ......!!
प्रिया
शुक्रवार, 25 दिसंबर 2015
अधूरा प्यार
सोमवार, 14 दिसंबर 2015
सत्संग..कितना सही कितना गलत
अनादिकाल से ही भारत में सत्संग करने की, गुरु बनाने की प्रथा चली आ रही है। हमें घर के बड़े बुजुर्गों से अक्सर यह सुनने मिलता के हम सत्संग में जा रहे हैं। या सत्संग की बातें बताते जो सुनने में काफी अच्छी भी लगती। तब सत्संग में ज्यादातर सिर्फ बड़े बुजुर्ग ही जाते जिन्होंने अपने सांसारिक दायित्व निभा लिए हों और अब संतों की शरण में जाकर मन की शान्ति चाहते हैं। किन्तु अब समय ने करवट ली है और अब सत्संग में सिर्फ बुजुर्ग ही नहीं बल्कि नोजवान यहाँ तक की बच्चे भी जाते हैं क्योंकि जैसे-जैसे समाज तरक़्क़ी करता जा रहा है वैसे-वैसे आदमी की उम्र पहले की अपेक्षा कम हो गयी है। क्योंकि अब समय के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने का तनाव भी होता है और ज्यादा तनाव के चलते कई बीमारियां छोटी उम्र में ही घेर लेती हैं। इसलिए अब सत्संग केवल बुजुर्गों के लिए नहीं होता। मन की शान्ति युवा वर्ग को भी चाहिए आज सत्संग में भी लोगों की काफी तादात देखी जाती है। और उनमें भी औरतों की संख्या आज की तारीख में ज्यादा है।
किन्तु एक प्रश्न मेरे दिमाग में सदैव कौंधता रहता है। हो सकता है कई लोग मुझसे इत्तेफाक भी रखते हों किन्तु एक बार मेरी इन बातों पर गौर जरूर करें।
"आज के समय में क्या सत्संग वाकई सत्संग होता हैं?"
मैंने जहाँ तक अपनी दादी को देखा तो वो सीधे साधे कपडे पहनकर सत्संग जाती। वहां से कुछ भगवान् की, ज्ञान की और संयम की बातें सुनकर आती और हमें बताती। मैं ये कतई नहीं कहती के आज के सत्संग में ये सब नहीं सिखाया जाता। सिखाया आज भी वही जाता है किन्तु क्या सीखने वाले वही सीखते हैं ? ये बात गौर करने लायक है।
कई पुरुष अभी इस मामले में काफी पीछे हैं किन्तु महिलाओं की भरमार देखी जाती है सत्संगों में। आज सत्संग के नाम पर दिखावा आडम्बर और घूमने का चलन चल पड़ा है। और तो और नेशनल कंपनी की तरह इनकी भी अलग-अलग शहरों में शाखाएं हो गयी हैं। कई बार एक शहर के लोग दूसरे शहरों में जाते हैं सत्संग करने और दूसरी बार वो लोग इनके शहरों में आते हैं। और जो मेहमान बनकर आते हैं उनकी मेजबानी यहाँ के सत्संग वाले करते हैं। और वो जिम्मेदारी, जैसे इनके रुकने की, खाने-पीने की व्यवस्था इस शहर के सत्संग सुनने वालों को करनी पड़ती है। कई जगह यह नहीं देखा जाता के सामने वाली की आर्थिक स्थिति क्या है! वो मदद करने में सक्षम है भी के नहीं! उसे गुरु के नाम पर कहा जाता है आपको यह करना ही पड़ेगा। वैसे ही अगर कोई साथ बाहर जाने के लिए तैयार न हो तो उसपर साथ चलने के लिए दबाव डाला जाता है। अगर उसके पति ने मना कर दिया हो तो सत्संग की कुछ औरते पहुंच जाती है उसके पति को मनाने अब पति बेचारा क्या कहे इतनी औरतों को! सो वह हां कह देता है। अब वह उस समय तो नहीं किन्तु बाद में अपनी भड़ास तो निकलेगा ही। तो यह सत्संग घर बनाने के काम आया या घर बिगाड़ने के यह अब हमे खुद तय करना है।
मैं नाम लेकर किसी पंथ के लोगों की भावनाओं को आहात नहीं करना चाहती किन्तु किसी सत्संग में तो यहाँ तक कहते हैं के भगवान कोई है ही नहीं। उनका गुरु ही उनका भगवान है। उस सत्संग पर जाने वाले घर में न तो किसी भगवान् की तस्वीर रखते हैं न ही कभी किसी मंदिर में जाते हैं और तो और अगर आप उन्हें प्रसाद कहकर देंगे तो वो लेने से मना कर देंगे हां अगर कुछ मीठा हुआ और उनका मन ललचाया तो वो मिठाई है , कहकर खा लेंगे लेकिन प्रशाद कहने पर नहीं लेंगे। वह अपने गुरु को ही भगवन मानते हैं। अगर उनके गुरु जी उनके आस पास के शहरों में सत्संग करने आ रहे हैं तो वो हर दिन के हिसाब से नए कपडे खरीदती हैं बल्कि खासतौर पर वेस्टर्न कपडे पहनकर जाती हैं। यही नहीं एक दूसरे के कपड़ों के बारे में बोलना और एक दूसरे को निचा दिखाना वहां की औरतों का चलन है। वो औरतें जो घर में एक चाय का कप तक नहीं बनाती उसपर भी बहु पर आश्रित होती हैं। घर में काम करने के लिए जिन्हें घुटनों का दर्द व् कई प्रकार तकलीफें होती हैं वो सत्संग पे झाड़ू लगाती, चप्पल उठाती, यहाँ तक के ईंटें तक ढोती देखी जाती हैं। पूछने पर कहती हैं "गुरु सेवा" कर रहें हैं। और वहां सेवा से वापस आने पर अक्सर घरों में देर तक सोती मिलेगी और पतिदेव को यह कहते हुए पायी जायेगी " आज तो गुरु सेवा में थक गयी हूँ खाना बाहर से ही लेते आना"। यह कैसी गुरु सेवा है? यह कैसा सत्संग है? जो आपको अपने पत्नी धर्म से अपने घर के प्रति जिम्मेदारियों से यहाँ तक के अपने हिन्दू धर्म में माने जाने वाले देवी देवताओं से या यूँ कहें के हिन्दू धर्म से ही दूर करता है। जहाँ आप मन की शान्ति पाने नहीं अपने कपडे दिखाने आडम्बर करने जाते हैं !!
वहीँ एक पंथ में तो यहाँ तक कहा जाता है की पति-पत्नी का रिश्ता होता ही नहीं रिश्ता सिर्फ भाई-बहन का होता है। वहां जाने वाले लोगों का तो इतना ब्रेन वाश किया जाता है के उस सत्संग पर जाने वाले कई जोड़ो को देखा है वो भाई-बहन की तरह जिंदगी जीते हैं। अब पति-पत्नी दोनों जाते हों तो बात अलग है। किन्तु अगर दोनों में से किसी एक ने भी गर वो पंथ अपनाया तो दूसरे साथी की जिन्दगी ही बेज़ार हो जाती है। उसके बाद या तो अपराध जन्म लेता है या फिर कुंठा अब दोनों ही हालात में घर तो टूटा ही। फिर वही बात सत्संग घर बनाने के लिए है या तोड़ने के लिए !!!
मेरा कतई ये कहना नहीं है के आप सत्संग में न जाएँ। जरूर जाएँ लेकिन जहाँ आडम्बर हो, जहाँ आपको आपके धर्म से ही डिगाया जाए, जहाँ आपकी आर्थिक स्थिति को आपकी मजबूरियों को न समझा जाए, जहाँ जाने से आपके घर में शान्ति नहीं अपितु कलह जन्म ले ऐसे सत्संग में जाने से न जाना ही अच्छा।
प्रिया वच्छानी
शुक्रवार, 11 दिसंबर 2015
मानव अधिकार
मानव अधिकार की धज्जियों को उड़ते देखा
हमने पल-पल यहाँ बच्चीयों को मरते देखा
थी जिनकी उम्र अभी गुड्डे-गुड़ियों संग खेलने की
उन्ही बच्चीयों के पेट में पाप को पलते देखा
मासूम बच्चीयां पैदा करती अनचाही संतान को
बच्ची हो कोख में तो विवाहिता का गर्भ गिरते देखा
ये कैसी लचर क़ानून वयवस्था है इस देश की
बलात्कारियों को खुले आम विचरण करते देखा
नहीं रही महफूज़ बेटियां अब अपने घरो में भी
बाप के हाथों भी बेटी की अस्मत को लुटते देखा
कभी मारी जाती कोख में, कभी पैदा कर फेकी जाती
दहेज़ के लोभियों के हाथों तिल-तिल कर जलते देखा
मानवता हो रही है शर्मसार हर रोज आज यहां
हवस के अंधे इंसानो को दानवों का रूप धरते देखा।
प्रिया
सोमवार, 7 दिसंबर 2015
क्यों दरकते हैं रिश्ते
पिछले एक दशक से देश भर में शादियां टूटने की घटनाओ में लगातार बढ़ोत्तरी हुई है। कई लोग इसका जिम्मेदार शिक्षित और कामकाजी महिलाओं को मान रहे हैं। सामाजिक व् नैतिक मूल्यों में आये बदलाव की वजह से महिलाओं की सोच बदली हैं। अब वह पहले से कहीं अधिक अपने अधिकारों को लेकर सजग हुई हैं। वह किसी भी तरह के अन्याय को अब बर्दाश्त नहीं कर रही। किन्तु अब तो कई जगह इसका जिम्मेदार इंटरनेट को भी माना जा रहा है, जो के काफी हद तक सही भी है।
जहाँ एक तरफ इंटरनेट की वजह से समाज ने प्रगति की है। वहीँ दूसरी तरफ नैतिक पतन भी हो रहा है। सबसे ज्यादा दुःख की बात यह है के सब जानते हुए भी कई लोग एक दूसरे की देखा-देखी अंधी खाई में गिरते जा रहे हैं। पहले अगर जीवनसाथी में या उसके स्वभाव में कोई कमी होती तो प्यार और धैर्य से उसे दूर करने की कोशिश की जाती। किन्तु आज के जमाने में लोगो की सोच बदल गयी है वो बजाय धैर्य से काम लेने के सहजता से दूसरे साथी की तलाश शुरू कर देते हैं। यही नहीं चाहे जीवन साथी में कोई कमी न भी हो किन्तु आज सोशल नेटवर्किंग साईट लोगों के घर टूटने की वजह भी बन रहे हैं। लोग पहले मजाक में यह सब शुरू करते हैं फिर धीर-धीर कब यह अलगाव का कारण बन जाता है यह पता भी नहीं चल पाता। वैसे भी इंसानी फितरत ही होती है जो चीज पास हो उसकी कोई कद्र नहीं होती और जो चीज दूर हो उसे पाने की ललक रहती है। यह कहावत सोशल नेटवर्किंग साईट पर बिलकुल सच साबित होती दिख रही है।
आज के समय में केवल पुरुष ही नहीं महिलाये भी अवैध सम्बन्ध बनाने में पीछे नहीं रहती।
किन्तु पुरुष हो या महिला ऐसा क्यों हो रहा है?
क्यों जीवन साथी होते हुए भी लोग बाहर ख़ुशी और प्यार ढूंढते हैं?
जाहिर है इसकी वजह कोई एक व्यक्ति नहीं हो सकता। क्योंकि एक हाथ से ताली नहीं बजती। यह जरुरी नहीं घर टूटने की कोई बड़ी वजहें हों कई बार छोटी अँदेखियां भी इसका कारण बनती हैं। वह कौन सी छोटी वजहें हैं आइये कुछ इस बारे में जानते हैं।
शुरुवात महिलाओं से करते हैं। कई महिलायें जब बाहर जाती हैं तब तो काफी सज-संवर कर जाती हैं किन्तु घर में वो अपने श्रृंगार का बिलकुल ध्यान नहीं रखती। बेतरबी से बंधे बाल, सिलवट भरे कपडे देखकर ऐसा लगता है मनो अभी नींद से उठी हैं। कभी कोई टोक भी दे तो ये जवाब आता है" घर में ही बैठी हूँ बाहर नहीं जा रही जो तैयार होकर बैठूं , वैसे भी अब तो शादी हो गयी अब क्या सजना"। ऐसा सोचना बिलकुल गलत है। पुरुष वर्ग हमेशा से ही सुंदरता की तरफ ज्यादा आकर्षित होते हैं। वो जब काम से थके वापस आये और सामने मुस्कुराकर सजी हुई पत्नी जब स्वागत करती है तो आधी थकान यूँ ही मिट जाती है। इसलिए सिर्फ बाहर ही नहीं घर पर भी तरतीब से रहें।
कई महिलायें पति की कही बातों पर ध्यान ही नहीं देती। जैसे उन्हें क्या पसंद है! क्या नहीं इससे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता वो वही करती हैं जो उन्हें पसंद हो। जो की गलत है हमेशा अपनी बात को ही नहीं पति की बात को उनकी पसंद नापसन्द को भी महत्तव देना चाहिए।
कई महिलाये शाम को पतिदेव के वापस आते ही दिन भर की अपनी रामायण सुनाने बैठ जाती हैं। आज मायके में ये हुआ, सास ने ननद ने ऐसा किया। अरे भई! दिन भर का थका आदमी घर आया है उसे प्यार से पानी, चाय दो पहले फिर आराम से कुछ उसकी सुनना, कुछ अपनी सुनाना।
इसी तरह पुरुष वर्ग को भी कुछ बातों का विशेष ध्यान देना चाहिए
ज्यादातर पुरुषों की ये प्रवृति होती है की वह दूसरी औरतों की तारीफ़ तो बहुत जल्दी कर देते हैं वही अपनी पत्नी की खूबियों को उपेक्षित कर देते हैं। एक बात सदैव याद रखिये स्त्रियां सिर्फ प्यार और तारीफ़ की ही भूखी रहती हैं और कभी-कभी इसी का फायदा पर पुरुष उठाते हैं
पुरषों की आदत होती है ज़रा सी बात पर वो पत्नी के मायके वालों पर ताने कसते हैं। जो की गलत हैं कोई भी लड़की अपने लिए चार बाते सुन भी लेगी किन्तु अपने मायके वालो के लिए नहीं सुन पाती और यह बातें झगड़े का कारण बन जाती हैं।
एक लड़की अपने रिश्ते-नाते, सहेलियां, घर यहाँ तक की अपना नाम और उपनाम भी छोड़कर नए रिश्ते, नया नाम अपनाती है उसके बदले वो और कुछ नहीं बस थोड़ी सी कदर, थोड़े प्यार और अपनेपन की अपेक्षा तो रख ही सकती है आपसे।
कुछ ऐसी ही छोटी-छोटी बातों पर ध्यान देने से रिश्ते न सिर्फ टूटने से बचेंगे बल्कि और मजबूत भी होंगे।
प्रिया वच्छानी
गुरुवार, 5 नवंबर 2015
सम्मान वापसी
खरबूजे को देखकर जैसे खरबूजा रंग बदल रहा है
वैसे ही सम्मान वापस करने का नया दौर चल रहा है
साहित्यकार फिर वैज्ञानिक अब अभिनेता इस राह आये हैं
चाटुकारिता से पाया था जो सम्मान वह लौटाने आये हैं
क्या सचमुच साम्प्रदायिकता की ऐसी आँधी आई है!
या यह नोटँकी विपक्षी दलों और मीडिया द्वारा फैलाई है!
क्या इतने दंगे हो रहे जो कोई और राह न दी दिखालायी है!
या फिर देश की तरक्की, अमन, शान्ति इनको रास न आई है !
ऐसा नहीं इतने सालों में देश में कोई ऐसी घटना न घटित हुई
पर अब तक इनका ज़मीर क्यों न जागा था सोचकर मैं चकित हुई
एक दादरी की बात पर इन बुद्धिजीवीयों नें इतना शोर मचा लिया
हुए कश्मीरी पंडित जब बेघर तब क्यों था मुँह में दही जमा लिया
हो साहित्यकार,वैज्ञानिक या अभिनेता इसी देश का खाते हैं
फिर क्यों आज एक पक्ष का सोचकर ज़हर उगल दिखाते हैं
वापस है लौटाता अपना सम्मान आज यह हकला इंसान
जिसनें कहा था मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही जाऊँगा पाकिस्तान
क्या हम नहीं जानते कैसे बन गए हो तुम इतने महान
क्यों ऐसी हरकतें कर तुम खुलवाते हो हमारी जुबान
माना लोकतंत्र है तुम बेहिचक मन की बात बोल सकते हो
पर क्या बोलना है, खुद भी तोअपने शब्दों को तोल सकते हो
चुपचाप जो काम आज तक करते हो वो तुम करते जाओ
देश का नमक खा कर देश से गद्दारी तो न कर दिखलाओ।
प्रिया
शुक्रवार, 28 अगस्त 2015
राखी
साँझ का वक्त एक तरफ सूरज डूबने को था दूसरी तरफ चाँद अपनी चाँदनी बिखेरने को तैयार था। तारे भी टिमटिमाते हुए अपनी मौजूदगी का अहसास करा रहे थे। पंछी अपने-अपने घोसलों में लौट आये। वही बाकी कर्मचारियों की तरह मनीष भी कारखाने में छुट्टी का साइरन बजने पर अपने घर की तरफ चला।
सारे दिन का थका मनीष हाथ मुँह धो जैसे ही खाना खाने बैठा
नंदिता ने कहा "याद है न कल रक्षाबंधन है।" मनीष के चेहरे पर ख़ुशी और चिंता मिश्रित भाव उभर आये।
"हां याद है।" वह इतना ही कह पाया
"कल मेरा भाई विनोद शाम तक आ रहा है , तो आप सुबह जल्दी ही दीदी से राखी बंधवा लेना ताकि शाम उसके आने तक हम लोग फ्री हो जाए।" नंदिता ने अपना एक तरफ़ा फैसला सुना दिया
मनीष सिर्फ हां के अलावा कुछ नहीं बोल सका इतने में नंदिता फिर बोली "अच्छा सुनो , कल दीदी को नेग क्या दोगे?"
"इस साल मेरी तनख्वाह में बढ़ोतरी हुई है तो सोच रहा हूँ इस साल नेग कुछ बढ़ा दू और साथ ही कुछ फल भी ले चलेगे। वैसे भी साल में दो बार रक्षाबंधन और भाईदूज के दिन ही तो जाना होता है दीदी के घर वैसे कहाँ समय मिल पाता है मुझे भी। और मम्मी के जाने के बाद दीदी भी कहाँ आती है अब यहाँ।" मनीष अपनी लय में बोलता चला गया
"जब फल ले जाने की सोच ही रहे हो तो नेग में बढ़ोतरी क्यों ?"नंदिता ने आँखे तरेरते हुए कहा " एक बात करो या फल या नेग पता भी है आज कल फल कितने महंगे हो गए हैं?"
मनीष नंदिता के इस स्वभाव से भली भांति परिचित था वह जानता था के नंदिता उसकी बात को जरूर काटेगी इसलिए खाली हाथ न जाना पड़े उसने नेग भी बढ़ाने की बात कही। मनीष का मन तो बहुत होता के नंदिता से कहे "मैं कमाता हूँ , मेरी बहने है उनको क्या देना क्या न देना यह सब कहने वाली तुम कौन होती हो।" किन्तु वह नहीं कह पाता क्योंकि उससे कुछ कहना मतलब घर में आठ दिनों की कलह की शुरुवात करना। घर में कोई बड़ा भी न था जिससे वह डरती। मनीष मन मसोसकर रह गया।
दूसरे दिन वही हुआ जो नंदिता ने तय किया था। फल तो ले गए पर नेग में कोई बढ़ोतरी न हुई। शाम को नंदिता का भाई विनोद आया राखी बंधवाकर वह रात की गाडी से ही रवाना भी हो गया।
उसके जाने के बाद नंदिता ने चहकते हुए मनीष को बताया "जानते हो विनोद मुझे कितना प्यार करता है , मेरे लिए कितना कुछ लाया है आज उसने मुझे न सिर्फ पिछले साल से ज्यादा नेग दिया बल्कि मेरे लिए साड़ी भी लाया और साथ ही बच्चों के लिए चॉकलेट और आपके लिए फल भी ले आया है। कितना प्यार करता है मेरा भाई मुझसे। भगवान् ऐसा भाई सबको दे " नंदिता यह सब पाकर ख़ुशी के मारे बोलती गई
अनायास ही मनीष कह उठा "वाकई बहुत प्यार करता है तुम्हारा भाई तुमसे, सच भगवान् ऐसा भाई सबको दे।"
बुधवार, 12 अगस्त 2015
अब तुम बड़े हो गए
वो हंसी वो कहकहे वो मुस्कुराहटें
सब के सब ना जाने कहां खो गए
रह गईं बस उदासी परेशानियां
लोग कहते हैं अब तुम बड़े हो गए
बीत गए मस्ती भरे वो प्यारे से दिन
वो खेल, वो खिलोने, वो पलछिन
वो बनकर अब इक दास्तां रह गए
लोग कहते हैं अब तुम बड़े हो गए
कागज़ की नाव बारिश में चलाना
न धूप का पता न छाँव का लगना
आज वो नज़ारे जाने कहाँ खो गए
लोग कहते हैं अब तुम बड़े हो गए
दोस्तों का रूठना , रूठकर मानना
अपनी बात की धौंस जमाना
अब वो लम्हे कहाँ सो गए
लोग कहते है अब तुम बड़े हो गए
चश्मा चढ़ा दादी की नक़ल उतारना
पापा की छोड़ी सिगरेट को फुंफकारना
अल्हड़पन की मस्ती में फ़ना हो गए
लोग कहते हैं अब तुम बड़े हो गए
छोटे भाई बहनो के लिए लड़ना
अपनी गलती दूसरों पर मढ़ना
गुस्से में घर से अब हम दूर हो गए
लोग कहते हैं अब तुम बड़े हो गए
वो कंचो के निशानों पर आँखे मोड़ना
जीत जाने पर अपनी अकड़ को जोड़ना
वो अहसास अब न जाने कहाँ खो गए
लोग कहते हैं अब तुम बड़े हो गए
वो मासूम बचपन की कहानियां
थोड़ी नादानियां थोड़ी शैतानियां,
दिन वो प्यारे ये आए और वो गए
लोग कहते है अब तुम बड़े हो गए
साथ जाते हम स्कूल मीत चार
याद आता कितना खास प्यार
सिर्फ अब वो कहानी किस्से हो गए
लोग कहते है कि अब तुम बड़े हो गए
प्यारे दोस्तों का हरपल साथ था
गम में भी ख़ुशी का अहसास था
वो निश्छल दोस्ती के ज़माने खो गए
लोग कहते हैं अब तुम बड़े हो गए
टीफिन में तो भरा प्यार अपार था
मस्ती का ही होता बस खुमार था
वो दिन कहाँ रफू चक्कर हो गए
लोग कहते है अब तुम बड़े हो गए
सोते के कान में चुपचाप रुई घुमाना
भैया बहन की पुस्तक को छुपाना
अब तो ऐसा करने से मन घबराए
लोग कहते है अब तुम बड़े हो गए
खेल खेल में यहाँ वहां छिप जाना
लड़ने के बाद साथ बैठ फिर खाना
दोस्त बहुत पर अब अपना किसे
लोग कहते है अब तुम बड़े हो गए
दूर हो गए मासूमियत के साये
अल्हड़पन,अबोध वो अठखेलियाँ
वो बेफिक्री के दिन कहीं खो गए
लोग कहते हैं अब तुम बड़े हो गए
बात बात पर निस्वार्थ मुस्कुराना
वो नए वस्त्र पहनकर इठलाना
दोस्तों संग शैतानियों के दिन खो गए
लोग कहते हैं अब तुम बड़े हो गए
जाम तोड़ते कभी आम पेड़ चढ़ते
छोटी छोटी बात पर थे बहुत लड़ते
वो दिन न जाने कहाँ अब लद गए
लोग कहते है अब तुम बड़े हो गए
वो प्यार हुआ था जो पहली नज़र में
वो रिश्ते बने थे जो बाली उमर में
वक्त के दरिया में वो कहां बह गए
लोग कहते हैं अब तुम बड़े हो गए
वो रातभर सितारों संग जागना
चाँद से महबूब की बाते करना
वो तारे अब ना जाने कहां सो गए
लोग कहते हैं अब तुम बड़े हो गए
चलती क्लास में घूमने का प्रोग्राम बनाना
बहार निकाले जाने पर दोस्तों को बुलाना
वो फिल्मों के शौक न जाने कहां खो गए
लोग कहते हैं अब तुम बड़े हो गए
कॉफी के बहाने दोस्तों संग वक्त बिताते
बेबात की बातो पर ठहाके लगाते
वो हसी वो ठहाके कब गुमनाम हो गए
लोग कहते हैं अब तुम बड़े हो गए
देखे थे कभी कुछ रंगीन से सपने
न जाने अब कहां खो गए वो अपने
सपनो की माला को संजोते रह गए
था जब बचपना सभी से शरमाते थे
ठीक से भी ना हम चल पाते थे
हौसलो ने दी जब ताकत खड़े हो गए
लोग कहते है अब तुम बड़े हो गए
कैसा वो दिलकश रूमानी समां था
उधर तुम हसीं थे इधर दिल जवां था
महल थे जो सपनों के सब ढह गए
लोग कहते हैं अब तुम बड़े हो गए
छज्जे में खड़े होकर तुम बुलाते थे
मुझको न जाने कितना लुभाते थे
न रहे वो बुलावे अब वो कहीं खो गए
लोग कहते है अब तुम बड़े हो गए
वो जो नरम नाजुक से अहसास थे
संग जीने मरने के जो वादे खास थे
वक्त की आंधियो में कहीं खो गए
लोग कहते है अब तुम बड़े हो गए
दूसरों के लिए अब वक्त गवांते है
अब ना होली ना दीवाली मनाते है
सपने दिल के दिल में ही सो गए
लोग कहते हैं अब तुम बड़े हो गए
बालों में अब सफेदी झलकने लगी
रेत मुट्ठी से जैसे सरकने लगी
लौट कर आए कब लम्हे जो गए
लोग कहते हैं अब तुम बड़े हो गए
कोई सुनता नहीं अब अपनी बातें
आँखों ही आँखों में कटती है रातें
अपने बच्चे ही अब बेगानेे जैसे हो गए
लोग कहते हैं अब तुम बड़े हो गए।
भरत , प्रिया , एकता , मधुर , दिनेश